सड़कें, जो जीवन को गति प्रदान करती हैं, कभी-कभी खतरे का पर्याय भी बन जाती हैं। इन खतरों को कम करने और सड़क पर चलने वालों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कानून एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मोटर वाहन अधिनियम की धारा 185 ऐसा ही एक प्रावधान है, जो नशे की हालत में वाहन चलाने से जुड़े अपराधों को परिभाषित करता है और उनके लिए दंड का निर्धारण करता है।
कानून के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति शराब या किसी अन्य नशे की हालत में सार्वजनिक स्थान पर वाहन चलाता है, और उसके खून में अल्कोहल की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक पाई जाती है (जिसे ब्रेथ एनालाइजर से मापा जाता है), तो वह धारा 185 के अंतर्गत अपराध का भागीदार होता है।
इस अपराध के लिए सजा का प्रावधान किया गया है। पहली बार पकड़े जाने पर 6 महीने तक की कैद या 10,000 रुपये का जुर्माना, या फिर दोनों ही सजाएं दी जा सकती हैं। वहीं, यदि कोई व्यक्ति बार-बार इस अपराध को दोहराता है, तो उसे 2 साल तक की कैद या 15,000 रुपये का जुर्माना, अथवा दोनों भुगतने पड़ सकते हैं।
सड़क दुर्घटनाओं को कम करने और लोगों के जीवन की रक्षा करने के उद्देश्य से, 2019 में इस धारा में संशोधन किया गया। इस संशोधन का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना था कि नशे में गाड़ी चलाने वालों के लिए सजा और कड़ी हो, जिससे लोग इस तरह के लापरवाह रवैये से बचें।
इसके अतिरिक्त, नशे की हालत में वाहन चलाते हुए पकड़े जाने पर ड्राइविंग लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है। इतना ही नहीं, संबंधित वाहन को भी जब्त करने का प्रावधान है। यदि शराब या ड्रग्स के नशे में गाड़ी चलाने के कारण कोई दुर्घटना होती है, तो दोषी व्यक्ति पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) के अंतर्गत और भी सख्त सजा लागू हो सकती है।
यह धारा सड़क सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण हथियार है। यह न केवल वाहन चालकों को उनकी जिम्मेदारी का एहसास कराता है, बल्कि समाज को भी यह संदेश देता है कि नशे में गाड़ी चलाना सिर्फ एक भूल नहीं, बल्कि एक गंभीर अपराध है। यह धारा हमें याद दिलाती है कि सड़क पर चलने वाले हर व्यक्ति की सुरक्षा हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है, और हमें इसका निर्वहन पूरी ईमानदारी से करना चाहिए।