यह मामला उस समय सामने आया जब महाविद्यालय में उपलब्ध 200 सीटों के मुकाबले 330 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए। इसका सीधा अर्थ यह है कि 130 से अधिक छात्राएं, अपनी योग्यता होने के बावजूद, महाविद्यालय में प्रवेश पाने से वंचित रह जाएंगी।
सुनील तावणीयां ने इस अवसर पर कहा कि यह विडंबना ही है कि एक तरफ सरकार बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अथक प्रयास कर रही है, वहीं दूसरी तरफ ज़रूरतमंद छात्राओं को शिक्षा प्राप्त करने से वंचित रहना पड़ रहा है। उन्होंने इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए उच्च शिक्षा मंत्री प्रेमचंद बैरवा के नाम एक ज्ञापन प्रेषित किया, जिसमें महाविद्यालय में सीटें बढ़ाने की पुरजोर मांग की गई है।
अब देखना यह है कि उच्च शिक्षा विभाग इस मामले में क्या कदम उठाता है और क्या श्रीडूंगरगढ़ की इन छात्राओं को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिल पाता है। यह घटना निश्चित रूप से बालिका शिक्षा के क्षेत्र में नीति निर्माताओं और समाज को एक साथ मिलकर सोचने और सकारात्मक कदम उठाने के लिए प्रेरित करती है।