स्वामी जी ने अपने प्रवचनों में गीता के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि आत्मा और परमात्मा एक ही स्वरूप हैं, और गीता हमें अपनी जड़ों से जुड़ना सिखाती है। उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित किया कि वे गीता के ज्ञान से जुड़कर जीवन के हर कार्य को ईश्वर प्रेम के लिए करें। साथ ही, उन्होंने अहंकार त्यागने और नशे से दूर रहने का भी आह्वान किया।
अपने संबोधन में स्वामी विमर्शानंद जी ने शिक्षकों को भी महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षक का आचरण विद्यार्थियों पर गहरा प्रभाव डालता है। इसलिए, शिक्षकों को स्वयं भी गीता से जुड़ना चाहिए और विद्यार्थियों को भी जोड़ना चाहिए, ताकि वे जीवन के रहस्यों को जान सकें और सफलता प्राप्त कर सकें।
स्वामी जी ने **ऋषिकुल संस्कृत विद्यालय** और **नानूदेवी आदर्श विद्या मंदिर** में भी विद्यार्थियों से मुलाकात की और उन्हें गीता लिखित परीक्षा में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया।
इस दौरान, प्रन्यास के तहसील प्रभारी कांतिप्रकाश दर्जी और वीरेंद्र कुमार व्यास भी स्वामी जी के साथ रहे। उन्होंने गीता लिखित परीक्षा और परीक्षा से संबंधित पुस्तक के बारे में जानकारी दी। स्कूल संचालकों ने स्वामी जी का अभिनंदन किया और परीक्षा के आयोजन में सहयोग करने का आश्वासन दिया। उन्होंने यह भी कहा कि वे अपने विद्यार्थियों को परीक्षा में शामिल होने के लिए प्रेरित करेंगे।
स्वामी विमर्शानंद जी महाराज के श्रीडूंगरगढ़ आगमन से विद्यालयों में एक सकारात्मक और आध्यात्मिक वातावरण निर्मित हुआ है। विद्यार्थियों और शिक्षकों में गीता के प्रति एक नई प्रेरणा का संचार हुआ है, जो निश्चित रूप से उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाएगी।