इस आयोजन का एक विशेष आकर्षण बाबा लालनाथजी महाराज की 46वीं वर्षोंली थी। इस अवसर पर उनके परिजनों द्वारा भेंट की गई उनकी सुंदर मूर्ति की स्थापना की गई। मूर्ति स्थापना के बाद, आश्रम परिसर श्रद्धा और भक्ति के रंगों से सराबोर हो गया।
आश्रम की महंत परंपरा का स्मरण करते हुए बताया गया कि लालनाथजी के बाद चेतननाथजी ने लगभग 16 वर्षों तक और उसके बाद शिवनाथजी ने 26 वर्षों तक महंत के रूप में सेवाएं दीं। वर्तमान में योगीराज बिहारीनाथजी आश्रम के महंत हैं, जो इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
इस विशेष अवसर पर अनेक संतों और महंतों का सान्निध्य प्राप्त हुआ। महंत विक्रमनाथजी (आलवास, सीकर), बारुनाथजी (सातड़ा धाम), लाधुनाथजी (बच्छरारा), प्रतिज्ञानाथजी व ओमनाथ जी (गुसाईसर), चंद्रनाथजी (पडीहारा), दुर्गनाथजी (भानुदा) सहित कई प्रतिष्ठित संत इस आयोजन में शामिल हुए। संत मनोहरजी महाराज ने कथा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए भक्तों को ज्ञान का मार्ग दिखाया।
मोमासर और आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण करने और रात्रिकालीन भजनों का आनंद लेने के लिए उमड़े। देर रात तक भजनों की रसधारा बहती रही, जिससे वातावरण भक्ति और आनंद से परिपूर्ण हो गया।
कार्यक्रम में गोरखनाथजी व गोगोजी का सांपों का अखाड़ा भी आकर्षण का केंद्र रहा। भगत आसाराम शर्मा (गोगामेड़ी लूंछ, रतनगढ़) और भगत कालूराम (नासरजी मेड़ी, रतनगढ़) ने सांपों के साथ रोमांचक करतब दिखाए, जिन्हें देखकर भक्त मंत्रमुग्ध हो उठे।
यह आयोजन न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान था, बल्कि एक ऐसा अवसर था जहाँ भक्ति, ज्ञान और परंपरा का संगम हुआ। भक्तों का उत्साह और संतों का सान्निध्य इस आयोजन को अविस्मरणीय बना गया।