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दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न, शामिल हुए अनेक प्रसिद्ध रचनाकार

प्रतिष्ठित रचनाकार मधु आचार्य आशावादी ने कहा कि शंकरदान सामौर जन-मन की पीड़ा को उजागर करने वाले जनकवि थे। उन्होंने अपने समय की सत्ता की विसंगतियों का काव्य के माध्यम से प्रतिकार किया। वे एक विद्रोही कवि थे, जिन्होंने पूरे देश में आज़ादी की अलख जगाई।

समापन समारोह के मुख्य अतिथि डॉ. भंवरसिंह सामौर ने कहा कि शंकरदान चारण काव्य परंपरा के अद्भुत कवि थे। उन्होंने अंग्रेजी सत्ता से मुक्ति और देश की आज़ादी के लिए आम जन के मन में आत्मविश्वास जागृत किया। उन्होंने शंकरदान सामौर के काव्य की वर्तमान में प्रासंगिकता और सार्थकता सिद्ध करते हुए उनके कृतित्व को उजागर किया।

विशिष्ट अतिथि डॉ. लक्ष्मीकांत व्यास ने कहा कि जन मानस में चेतना जागृत कर आज़ादी की अलख जगाने वाले शंकरदान सामौर आधुनिक राजस्थानी काव्य के प्रथम जनकवि थे। उन्होंने अपना पूरा काव्य लोक कल्याण की भावना से रचा था।

जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय के राजस्थानी विभागाध्यक्ष डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि शंकरदान सामौर ने राजस्थानी साहित्य को एक नया युगबोध प्रदान किया। उन्होंने परम्परागत रूप से चलने वाली मानवता की जड़ता को तोड़कर समाज में सांस्कृतिक मान्यताओं के नये रूप स्थापित किए। उनके अनुसार, शंकरदान सामौर असल में युद्ध के नहीं, जीवन के कवि थे।

इस सत्र में डॉ. रेणुका व्यास नीलम और डॉ. गौरीशंकर प्रजापत ने कवि शंकरदान सामौर की साहित्य साधना विषयक अपने आलोचनात्मक शोध आलेख प्रस्तुत किए। सत्र का संचालन नगेंद्र नारायण किराड़ू ने किया।

द्वितीय सत्र में डॉ. मंजूला बारहठ ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कवि शंकरदान सामौर को एक महान क्रांतिकारी इतिहास पुरुष बताया। इस सत्र में राजेन्द्र जोशी और गोविंद गौरवसिंह ने कवि शंकरदान सामौर के जीवन के ऐतिहासिक पक्ष विषयक अपने आलोचनात्मक शोध आलेख प्रस्तुत किए। सत्र का संचालन डॉ. गीता सामौर ने किया।

कार्यक्रम के प्रारंभ में सभी अतिथियों का साफा पहनाकर, माल्यार्पण कर एवं स्मृति चिन्ह से सम्मान किया गया। समापन सत्र का संचालन राजस्थानी रचनाकार राजेन्द्र जोशी ने किया। इस अवसर पर ख्यातनाम कवि-आलोचक प्रोफेसर (डॉ.) अर्जुनदेव चारण सहित अनेक प्रतिष्ठित रचनाकार, मातृभाषा साहित्य प्रेमी एवं शोध-छात्र मौजूद रहे।

संगोष्ठी ने शंकरदान सामौर के विचारों और उनकी रचनाओं को एक बार फिर जीवंत कर दिया, जिससे श्रोताओं को उनके जीवन और कार्य के बारे में गहराई से जानने का अवसर मिला। शंकरदान सामौर का साहित्य आज भी प्रासंगिक है और लोगों को प्रेरित करता है।

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