न्यायमूर्ति ढंड ने संविधान के अनुच्छेद 243E और पंचायतीराज अधिनियम की धारा 17 का हवाला देते हुए कहा कि पंचायतों का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही चुनाव कराना अनिवार्य है। उन्होंने आगे कहा कि यदि बार-बार चुनाव में देरी हो रही है, तो राज्य चुनाव आयोग का यह दायित्व है कि वह हस्तक्षेप करे और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बहाल करे, ताकि जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव कर सके।
गौरतलब है कि प्रदेश की 6,759 ग्राम पंचायतों का कार्यकाल जनवरी 2025 में समाप्त हो गया था। इसके बाद सरकार ने इन पंचायतों में पूर्व सरपंचों को प्रशासक नियुक्त कर दिया था। हालांकि, बाद में भ्रष्टाचार और कदाचार के आरोपों के चलते कई प्रशासकों को हटा दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने अदालत में कहा कि सरकार ने बिना किसी जांच और सुनवाई के उन्हें हटाने का आदेश दिया, जो नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। वहीं, सरकार का पक्ष था कि प्रशासक एक अस्थायी व्यवस्था है, इसलिए उन्हें हटाने में किसी विशेष प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक नहीं है।
अदालत ने इस मामले में याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाते हुए सरकार के प्रशासकों को हटाने के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने यह भी कहा कि सरकार ने नैसर्गिक न्याय की अनदेखी की है, इसलिए उसे दो महीने के भीतर नए सिरे से जांच करके फैसला लेना चाहिए।
इस बीच, पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने भी एक याचिका दायर की है, जिसमें उन्होंने कहा है कि प्रदेश की 55 नगरपालिकाओं का कार्यकाल नवंबर 2024 में पूरा हो गया, लेकिन अब तक चुनाव नहीं हुए हैं। दूसरी ओर, गिरिराज सिंह देवंदा ने ग्राम पंचायतों में प्रशासकों की नियुक्ति को अदालत में चुनौती दी है।
इन दोनों याचिकाओं पर उच्च न्यायालय ने 12 अगस्त को सुनवाई पूरी कर ली थी और फैसला सुरक्षित रख लिया था। याचिकाओं में यह भी कहा गया है कि सरकार का यह रवैया संविधान, पंचायतीराज अधिनियम और नगरपालिका अधिनियम-2009 का खुला उल्लंघन है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
उच्च न्यायालय के इस फैसले ने एक बार फिर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के महत्व को उजागर किया है और यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी कारण से चुनावों को टालना उचित नहीं है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस फैसले के आलोक में क्या कदम उठाती है और कब तक प्रदेश में पंचायत और नगरपालिका चुनाव कराती है।