मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सरकार के उस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें इन दुकानों को नगर सीमा के भीतर बताया गया था। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “सरकार ने म्युनिसिपल एरिया की आड़ में हाईवे को लिकर-फ्रेंडली कॉरिडोर बना दिया है, जो अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
राज्य सरकार ने अपनी दलील में बताया था कि प्रदेश की 7665 दुकानों में से 1102 दुकानें नेशनल और स्टेट हाईवे पर स्थित हैं और इनसे सालाना 2221.78 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त होता है। लेकिन न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि “हम 2200 करोड़ रुपए के राजस्व के लिए लोगों की जान जोखिम में नहीं डाल सकते। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन की सुरक्षा सर्वोपरि है।”
कोर्ट ने वर्ष 2025 में नशे में गाड़ी चलाने (ड्रंक एंड ड्राइव) के मामलों में लगभग 8% की वृद्धि पर चिंता व्यक्त की। जयपुर के हरमाड़ा और फलोदी में हाल ही में हुए भीषण सड़क हादसों का हवाला देते हुए, जिनमें 15-15 लोगों की जान गई थी, कोर्ट ने कहा कि शराब पीकर गाड़ी चलाना जानलेवा साबित हो रहा है।
उच्च न्यायालय ने इस संबंध में कुछ महत्वपूर्ण निर्देश भी जारी किए हैं:
1. **दायरा:** हाईवे से 500 मीटर के भीतर कोई भी शराब की दुकान संचालित नहीं होगी।
2. **समय सीमा:** राज्य सरकार को दो महीने के भीतर सभी 1102 ठेकों को हटाना या स्थानांतरित करना होगा।
3. **विज्ञापन पर रोक:** हाईवे से दिखाई देने वाले किसी भी शराब के विज्ञापन या होर्डिंग पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा।
4. **अगली सुनवाई:** मामले की अगली सुनवाई 26 जनवरी 2026 को होगी, जिसमें आबकारी आयुक्त को अनुपालन रिपोर्ट पेश करनी होगी।
यह फैसला सड़क सुरक्षा और जीवन की सुरक्षा के प्रति न्यायालय की गंभीरता को दर्शाता है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन निर्देशों का पालन किस प्रकार करती है और इसका राजमार्गों पर शराब की उपलब्धता और दुर्घटनाओं की संख्या पर क्या प्रभाव पड़ता है।