बच्चों का उत्साह देखते ही बनता था। वे प्रभात फेरियों और रैलियों में शामिल हुए, जिनकी आवाज़ें ग्रामीण अंचलों में भी गूंज उठीं, और लोगों को इस मुद्दे पर सोचने के लिए प्रेरित किया। बच्चों के जोश को देखकर आमजन भी इस अभियान से जुड़ने लगे।
मरूभूमि शोध संस्थान के सचिव और साहित्यकार श्याम महर्षि ने अभियान की जानकारी देते हुए बताया कि नई शिक्षा नीति मातृभाषा आधारित प्राथमिक शिक्षा पर ज़ोर देती है। ऐसे में राजस्थानी को मान्यता मिलना शिक्षा की गुणवत्ता और विद्यार्थियों के समग्र विकास के लिए बेहद ज़रूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि इतनी समृद्ध शब्द-संपदा और साहित्यिक परंपरा होने के बावजूद राजस्थानी को अब तक मान्यता नहीं मिल पाई है, जो कि दुखद है।
अभियान के संयोजक, साहित्यकार रवि पुरोहित ने इस बात पर ज़ोर दिया कि राजस्थानी में उच्च शिक्षा तक के पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं, साहित्य अकादमी से इसे मान्यता मिली हुई है, और राज्य अकादमी भी इसका संचालन कर रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर राजस्थानी भाषा मान्यता के योग्य नहीं है, तो ये सारी व्यवस्थाएं फिर किस काम की हैं?
अभियान की समन्वयक, साहित्यकारा भगवती पारीक ‘मनु’ ने बताया कि लिखमादेसर, बिग्गा, सातलेरां, जैसलसर, अभयसिंहपुरा और श्रीडूंगरगढ़ शहरी क्षेत्र में सुबह-सुबह छात्रों ने रैलियां निकालीं। ग्रामीणों ने जगह-जगह बच्चों का हौसला बढ़ाया। शिक्षित वर्ग का इस अभियान से जुड़ना इसे और भी ताक़त दे रहा है।
श्री गुरु हंसोजी धाम लिखमादेसर के पीठाधीश संत सोमनाथ ने रैली को हरी झंडी दिखाते हुए कहा कि अब ग्रामीण भी अपनी भाषा और संस्कृति को आगे बढ़ाने का संकल्प ले रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह आंदोलन अब सिर्फ विद्यार्थियों या साहित्यकारों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह आम लोगों के अस्तित्व का प्रतीक बन चुका है।
हंसोजी धाम से गणगौरी चौक तक निकली रैली में राधेश्याम सिद्ध, एमएससी अध्यक्ष लूणनाथ सिद्ध, शेरनाथ, शिक्षाविद लक्ष्मीकांत वर्मा, स्काउट गाइड दल सहित कई प्रतिष्ठित लोग शामिल हुए।