इस महत्वाकांक्षी परियोजना की रूपरेखा मुंबई, गंगाशहर, श्रीडूंगरगढ़, भुज और नोखा में तैयार की गई है। कई स्थानों पर भूमि का चयन भी हो चुका है और निर्माण कार्य की शुरुआत होने वाली है। इस श्रृंखला में श्रीडूंगरगढ़ का नाम भी जुड़ गया है, जहां भामाशाह भीखमचंद और सुशीला पुगलिया दंपत्ति ने विद्यालय के लिए भूमि दान करने और निर्माण करवाने का संकल्प लिया है।
इस सिलसिले में, कोबा में आचार्य महाश्रमण की सानिध्य में ‘नेशनल बोर्ड ऑफ गवर्नर्स’ और शिक्षा विशेषज्ञों की एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी आयोजित की गई। सभी सदस्यों ने आचार्य से आशीर्वाद प्राप्त किया और महासभा के पदाधिकारियों ने अतिथियों का स्वागत किया।
आचार्य महाश्रमण ने अपने मंगल संदेश में शिक्षा को एक पवित्र तत्व बताते हुए कहा कि शिक्षा और चिकित्सा समाज की स्थायी आवश्यकताएं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस योजना से न केवल तेरापंथ समाज, बल्कि अन्य वर्गों के बच्चों को भी लाभ मिलेगा। उन्होंने शिक्षा के साथ संस्कारों पर विशेष ध्यान देने की अपेक्षा जताई।
संगोष्ठी स्थल पर छोटे बच्चों ने प्रस्तावित यूनिफॉर्म में, पारंपरिक तरीके से तिलक लगाकर अतिथियों का स्वागत किया। बोर्ड सदस्यों ने जैन यंत्रों से अंकित ताम्रपत्र पर स्वस्तिक उकेरकर महासभा पदाधिकारियों को समर्पित किए। सूत्रों के अनुसार, इन ताम्रपत्रों को आगामी विद्यालयों की नींव में स्थापित किया जाएगा।
महासभा उपाध्यक्ष समीर वकील ने विद्यालय श्रृंखला की परिकल्पना और विजन प्रस्तुत किया, जबकि अर्बन डेवलपर हितेंद्र मेहता ने आर्किटेक्चरल प्लान का वॉकथ्रू दिखाया। मुनि विश्रुत कुमार ने आध्यात्मिक मार्गदर्शन दिया। सभी सदस्यों ने अपने सुझाव और विजन को लिखकर एक ‘टाइम कैप्सूल’ में सुरक्षित किया, जिसे पाँच वर्ष बाद लाभ पंचमी के दिन खोला जाएगा, ताकि प्रगति का मूल्यांकन किया जा सके।
श्रीडूंगरगढ़ में ‘आचार्य महाश्रमण इंटरनेशनल स्कूल’ की स्थापना, शिक्षा के क्षेत्र में एक नई गाथा लिखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। भामाशाह भीखमचंद-सुशीला पुगलिया दंपत्ति द्वारा भूमि दान करने का संकल्प, तेरापंथ समाज की भावी पीढ़ियों को संस्कार और शिक्षा का एक मजबूत आधार प्रदान करेगा।