बजरंग सुथार, जीवन के प्रति अगाध आस्था और नकारात्मक भावों को भी अपनी कला में उकेरने के लिए जाने जाते थे। उनकी कला में जीवन की गहरी समझ और मानवीय संवेदनाओं का अनूठा मिश्रण था।
वर्ष 1994 में पैरालाइसिस के अटैक ने उनके शरीर को जकड़ लिया था। शारीरिक रूप से अक्षम होने के बावजूद, उन्होंने हार नहीं मानी। अपनी दो उंगलियों को ही अपना सहारा बनाया और रंगों के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त करने लगे। उनकी कला में वो ताक़त थी, जिसने उन्हें देश-विदेश में एक खास पहचान दिलाई।
जयपुर और दिल्ली की प्रसिद्ध आर्ट गैलरियों में उनकी तस्वीरों की प्रदर्शनियां आयोजित की गईं, जहाँ कला प्रेमियों ने उनकी कला को सराहा और उनके जीवन दर्शन को समझा।
श्रीडूंगरगढ़ में अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। बजरंग सुथार भले ही आज हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनकी कला हमेशा हमें प्रेरित करती रहेगी। उनकी बनाई हुई तस्वीरें जीवन के रंगों को और भी गहरा कर देंगी, और हमें यह याद दिलाती रहेंगी कि विपरीत परिस्थितियों में भी आशा और रचनात्मकता का दामन थामे रखना कितना महत्वपूर्ण है।