गजेन्द्र सिंह आऊ ने शिविर के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि, “क्षात्र धर्म का पालन करना हमारा सर्वोच्च लक्ष्य है, और इस शिविर में उसी का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है।”
शिविर की दिनचर्या शंखध्वनि के साथ शुरू होती है, जो युवाओं को प्रातः काल में ही जागृत कर देती है। इसके पश्चात योगासन, व्यायाम और ध्यान के माध्यम से शारीरिक और मानसिक शक्ति का विकास किया जाता है। दिनभर मंगलाचरण, प्रार्थना, सहगायन, शारीरिक-बौद्धिक खेल, चर्चा सत्र, विनोद कार्यक्रम और सामूहिक हवन जैसे आयोजनों का क्रम चलता रहता है। रात्रि में तलवार से पहरा देने की प्राचीन परंपरा का भी निर्वाह किया जा रहा है, जो क्षत्रिय परंपरा के शौर्य और दायित्व बोध का प्रतीक है।
शिविर में शिक्षण का दायित्व संभाग प्रमुख रेवंतसिंह जाखासर, गुलाबसिंह आशापुरा, भागीरथसिंह सेरूणा, हनुवंतसिंह आशापुरा, किशनसिंह गौरीसर, मनोहरसिंह टावरीवाला, कैलाशसिंह ढींगसरी, संदीपसिंह पुंदलसर, भागीरथसिंह, विजयसिंह, नरेंद्रसिंह, शिवसिंह झंझेऊ और रेवंतसिंह रणजीतपुरा निभा रहे हैं। ये सभी प्रशिक्षक युवाओं को क्षात्र धर्म के विभिन्न पहलुओं से अवगत करा रहे हैं और उन्हें जीवन में उतारने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
शिक्षण संस्थान के रघुवीरसिंह लखासर ने बताया कि शिविर की व्यवस्था में कल्याणसिंह झंझेऊ, रणवीरसिंह लखासर और गांव के अन्य कार्यकर्ता सक्रिय रूप से सहयोग कर रहे हैं। उनके सहयोग से शिविर का संचालन सुचारू रूप से चल रहा है।
यह शिविर युवाओं को क्षत्रिय मूल्यों और आदर्शों से परिचित करा रहा है, साथ ही उन्हें एक अनुशासित और संगठित जीवन जीने की प्रेरणा भी दे रहा है। यह शिविर निश्चित रूप से इन युवाओं के जीवन में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन लाएगा और उन्हें समाज के लिए एक बेहतर नागरिक बनाएगा।