मेनका देवी, जिन्होंने 2015 से 2020 तक पंचायत का नेतृत्व किया, बताती हैं कि उनके कार्यकाल में कई विकास कार्य करवाए गए थे, लेकिन लगभग 29 लाख रुपए का भुगतान शासन स्तर पर लंबित था। उन्होंने बताया कि इस भुगतान के लिए उन्होंने पंचायत समिति और जिला परिषद में कई बार पत्राचार किया और व्यक्तिगत रूप से भी अधिकारियों से निवेदन किया, लेकिन कोई समाधान नहीं निकल पाया।
“स्थिति ऐसी हो गई थी कि जिन एजेंसियों ने कार्य किया था, वे लगातार भुगतान की मांग कर रही थीं। मुझे अपनी जमीन बेचकर पैसे चुकाने की नौबत आ गई थी। ऐसा लग रहा था मानो मैं दिवालिया हो जाऊंगी,” मेनका देवी ने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए कहा।
इसी वर्ष अप्रैल में मेनका देवी ने जिला परिषद सीईओ सोहनलाल को लिखित रूप में अपनी समस्या से अवगत कराया। मामला पुराना होने के कारण राज्य सरकार की स्वीकृति आवश्यक थी। सूत्रों के अनुसार, सीईओ ने इस मामले को प्राथमिकता दी और उच्च स्तर पर लगातार पत्राचार किया, जिसके परिणामस्वरूप सरकार ने भुगतान की अनुमति जारी कर दी।
इस घटनाक्रम पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए मेनका देवी ने कहा, “यह एक लंबा संघर्ष था जो अब समाप्त हो गया है। राज्य सरकार और जिला परिषद ने हमारी पीड़ा को समझा, और यह निर्णय हमारे लिए एक बड़ी राहत है। मैं सरकार और जिला परिषद की आभारी हूँ।”
इस मामले के हल होने से यह स्पष्ट होता है कि यदि स्थानीय प्रशासन और सरकार मिलकर काम करें तो ग्रामीण विकास से जुड़े मुद्दों का समाधान संभव है। मेनका देवी का अनुभव यह भी दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले जनप्रतिनिधियों को कई बार किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और एक संवेदनशील प्रशासनिक दृष्टिकोण से कैसे सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।