मरने के बाद भी जीवन को सार्थक बनाने की दिशा में एक प्रेरणादायक कदम सामने आया है। श्रीडूंगरगढ़ क्षेत्र में देहदान के प्रति जागरूकता बढ़ रही है, और इसी कड़ी में 92 वर्षीय वैद्य जमनालाल स्वामी ने देहदान कर मानवता के लिए एक अनूठी मिसाल पेश की है।
वैद्य जमनालाल स्वामी, जो श्रीडूंगरगढ़ विधानसभा क्षेत्र के गांव बादनूं के निवासी थे, उन्होंने जीवन भर लोगों की सेवा की। वृद्धावस्था में उन्होंने महसूस किया कि मृत्यु के बाद भी उनका शरीर मेडिकल रिसर्च के काम आ सकता है। उनकी इस इच्छा का सम्मान करते हुए, उनके परिवार ने मरणोपरांत उनकी देह को बीकानेर के सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज को सौंपा।
परिवार के सदस्यों ने बताया कि वैद्यजी हमेशा समाज के कल्याण के लिए तत्पर रहते थे, और देहदान का उनका निर्णय भी इसी भावना का प्रतीक है। शनिवार दोपहर, उनके निधन के बाद, परिवार ने देहदान की प्रक्रिया को पूरा किया।
बादनूं के सरपंच प्रतिनिधि मालाराम नागा ने बताया कि वैद्यजी गांव के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे, और 92 वर्ष की आयु में पहली बार बीमार हुए थे। उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए, परिवार ने उनके निधन पर उनकी देह दान करने का फैसला किया।
वैद्य जमनालाल स्वामी के पुत्रों – ओमप्रकाश, सत्यनारायण, जीवराज और मन्नीराम – ने देहदान की प्रक्रिया को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. सुरेंद्र वर्मा और अधीक्षक संजीव पूरी ने देह पर पुष्पचक्र अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। कॉलेज के प्रोफेसर शंकरलाल जाखड़ का भी इस प्रक्रिया में विशेष सहयोग रहा।
एनोटॉमी डिपार्टमेंट के एचओडी डॉ. राकेश मीणा ने देह दान स्वीकार किया। इससे पहले, विभाग के डॉ. रामेश्वर व्यास ने बादनूं पहुंचकर शरीर की जांच की और शरीर संरचना विभाग में देह को लिए जाने की स्वीकृति जारी की।
इस अवसर पर, शोकाकुल परिवार को सांत्वना देने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे। सभी ने वैद्य जमनालाल स्वामी और उनके परिवार के इस निर्णय की सराहना की और उनके प्रति आभार व्यक्त किया।
इस मौके पर स्वामी परिवार के विद्याधर, उमेश, कमलेश सहित जयनारायण घिंटाला, डालाराम घिंटाला, सहीराम भूकर, सीताराम सिहाग, राजेश बिजारणियां, हरिराम, देवासिंह, लेखराम भाट, राजाराम भूकर, बजरंग गोदारा, राजेंद्र, हड़मानाराम घिंटाला सहित अनेक गणमान्य ग्रामीण उपस्थित थे।
वैद्य जमनालाल स्वामी का यह कदम निश्चित रूप से देहदान के प्रति लोगों को जागरूक करेगा और मेडिकल शिक्षा को नए आयाम देगा। उनका जीवन और उनका यह अंतिम कार्य, दोनों ही प्रेरणादायक हैं।