इंडोनेशिया की क्वारिन्टाइन अथॉरिटी (IQA) की एक रिपोर्ट ने इस फैसले को जन्म दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत से भेजी जा रही मूंगफली में एफ्लाटॉक्सिन की मात्रा तय मानकों से अधिक पाई गई है। यह आदेश 27 अगस्त को जारी किया गया था, और 3 सितंबर से इसे लागू कर दिया गया।
इस खबर ने बीकानेर की मंडियों में हलचल मचा दी है। मंडियों में मूंगफली की आवक तो जारी है, लेकिन खरीदारों की दिलचस्पी कम हो गई है। व्यापारियों के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं। उन्हें डर है कि अगर यह निर्यात प्रतिबंध लंबे समय तक जारी रहा, तो मूंगफली के भाव में 10 से 15% तक की गिरावट आ सकती है।
हर साल, भारत से लगभग 2.25 लाख टन मूंगफली इंडोनेशिया भेजी जाती है, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा राजस्थान के बीकानेर जिले का होता है। बीकानेर की मूंगफली, अपने मीठे स्वाद और बड़े दानों के लिए, विदेशी बाजारों में एक खास पहचान रखती है।
इस साल, जिले में 2.90 लाख हेक्टेयर में मूंगफली की बुआई हुई है और अनुमान है कि 8.70 लाख मीट्रिक टन उत्पादन होगा। फिलहाल, बीकानेर की प्रमुख मंडियों में मूंगफली 4500 से 6500 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बिक रही है।
लेकिन यह एफ्लाटॉक्सिन है क्या, जो इतनी चिंता का कारण बना हुआ है? असल में, एफ्लाटॉक्सिन एक जहरीला यौगिक है जो मूंगफली में नमी और गलत भंडारण के कारण पैदा होता है। यह फफूंद से उत्पन्न होता है और इसे लीवर कैंसर, पाचन संबंधी समस्याओं और कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए जिम्मेदार माना जाता है। यही कारण है कि कई देशों ने इसके लिए सख्त गुणवत्ता मानक लागू किए हैं।
मंडियों में इन दिनों मूंगफली की भरपूर आवक है, लेकिन इंडोनेशिया के प्रतिबंध के बाद खरीदारों की संख्या में कमी आ गई है। व्यापारी बताते हैं कि पिछले साल, मूंगफली का एक बड़ा हिस्सा सीधे निर्यात के लिए खरीदा जाता था, लेकिन इस बार स्टॉक स्थानीय मिलों तक ही सीमित रह गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के मूंगफली निर्यात का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इंडोनेशिया को जाता है। अब, इस बाजार के बंद होने से न केवल कीमतों पर दबाव बढ़ेगा, बल्कि किसानों को भुगतान में भी देरी हो सकती है, क्योंकि माल मंडियों में लंबे समय तक फंसा रह सकता है।
कृषि विशेषज्ञों का सुझाव है कि यदि भारत ने भंडारण और गुणवत्ता जांच प्रणाली को मजबूत नहीं किया, तो आने वाले समय में वियतनाम और चीन जैसे बाजार भी दूरी बना सकते हैं। सरकार और निर्यात एजेंसियों को किसानों को एफ्लाटॉक्सिन नियंत्रण की तकनीकें सिखानी चाहिए। जैसे कि खेतों में जलभराव से बचाव, कटाई के तुरंत बाद सुखाई, और वैज्ञानिक गोदामों में भंडारण।
यह संकट एक अवसर भी है, एक ऐसा पल जब हम अपनी कृषि पद्धतियों पर पुनर्विचार कर सकते हैं और यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि हमारी मूंगफली न केवल स्वादिष्ट हो, बल्कि सुरक्षित भी हो।