आड़सर बास स्थित मूंधड़ा मंदिर के पुजारी जगदीश शर्मा ने आंवले के औषधीय और आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि आयुर्वेद में आंवले का अद्वितीय स्थान है। उन्होंने कहा कि मानव शरीर के लिए आवश्यक छह रसों में से पांच रस आंवले में पाए जाते हैं, जो इसे स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी बनाते हैं।
पुजारी जी ने आगे बताया कि आंवला भगवान विष्णु और शिव दोनों को ही प्रिय है। मान्यता है कि आंवले के वृक्ष की पूजा करने से भगवान की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है।
शुक्रवार की सुबह, श्रीडूंगरगढ़ की महिलाओं ने सामूहिक रूप से आंवले के वृक्ष का पूजन किया। उन्होंने जल, धूप, दीप, फूल और तुलसी दल अर्पित कर वृक्ष की आराधना की। इस अवसर पर, महिलाओं ने व्रत कथा सुनी और वृक्ष की परिक्रमा की। कई श्रद्धालु महिलाओं ने मंत्रों का जाप करते हुए 108 परिक्रमाएं पूर्ण कीं।
शहर के विभिन्न मंदिरों में भी आंवले के वृक्षों की पूजा के लिए महिलाओं का तांता लगा रहा। हर तरफ आस्था और श्रद्धा का माहौल था, जो प्रकृति और संस्कृति के इस सुंदर संगम को और भी जीवंत बना रहा था। आंवला नवमी का यह पर्व श्रीडूंगरगढ़ में एक बार फिर प्रेम, भक्ति और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक बनकर उभरा।