आज, धरने के 366वें दिन, समिति के सदस्यों ने मुख्यमंत्री के नाम एक ज्ञापन सौंपा और अपनी मांग को फिर से दोहराया। उनकी आवाज में दर्द और निराशा दोनों झलक रहे थे। उन्होंने बताया कि ट्रोमा सेंटर के लिए ज़मीन चिह्नित भी हो चुकी है और पट्टा भी जारी हो चुका है, लेकिन इसके बावजूद निर्माण कार्य शुरू नहीं हो रहा है।
समिति के सदस्यों का कहना है कि इस वजह से क्षेत्र में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं और अन्य गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों को तत्काल बीकानेर रेफर करना पड़ता है। उनकी नाराज़गी इस बात पर थी कि अगर यहाँ ट्रोमा सेंटर बन जाए तो हर साल सैकड़ों परिवार उजड़ने से बच सकते हैं और समय पर इलाज मिलने से अनगिनत जानें बचाई जा सकती हैं।
धरने पर बैठे लोगों का कहना है कि ट्रोमा सेंटर की कमी के चलते कई बार गंभीर रूप से घायल लोगों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता, जिससे उनकी जान पर बन आती है। वे एक ऐसे केंद्र की उम्मीद लगाए बैठे हैं जहाँ तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो और लोगों को जीवनदान मिल सके।
समिति के सदस्यों ने अपनी मांग को दोहराते हुए संघर्ष जारी रखने का संकल्प लिया है। उनका कहना है कि जब तक ट्रोमा सेंटर का निर्माण शुरू नहीं हो जाता, वे अपना धरना जारी रखेंगे। इस दौरान धरना स्थल पर समिति के मदनलाल प्रजापत, मुकेश ज्याणी, गौरव टाडा, मालाराम कुलड़िया, डूंगरगराम ठुकरियासर, हुकमाराम, शंकरलाल, प्रकाश गांधी, राजेंद्र प्रसाद स्वामी, श्रीकिशन नैण, जावेद बेहलिम, सुखाराम महिया, सोनिया राजपुरोहित, ओमप्रकाश कालवा, भंवरलाल, बालूराम दुलचासर, रवि, रामनिवास बाना सहित अनेक सदस्य मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में नारे लगाते हुए ट्रोमा सेंटर का निर्माण जल्द शुरू करवाने की मांग की।
यह एक साल लंबा संघर्ष न केवल ट्रोमा सेंटर की ज़रूरत को दर्शाता है, बल्कि आम लोगों के उस अटूट विश्वास को भी दर्शाता है जो उन्हें अपनी सरकार और व्यवस्था से है। देखना यह है कि उनकी यह उम्मीद कब पूरी होती है और श्रीडूंगरगढ़ को अपना ट्रोमा सेंटर कब मिलता है।