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मौजिजों ने किया विप्रवर का आदर सत्कार, स्वामी ने दिया पुष्कर आकर यज्ञ में शामिल होने का आमंत्रण

श्रीडूंगरगढ़, 15 अक्टूबर 2025।

आज के दौर में, जब जीवन की अनिश्चितता हर पल मंडरा रही है, और विश्व आतंकवाद और अराजकता से जूझ रहा है, तब शांति की तलाश और भी ज़रूरी हो गई है। इस अशांत समय में, मानव जीवन में सुख और शांति की स्थापना के उद्देश्य से एक असाधारण पहल की जा रही है। आगामी 8 मार्च से 14 अप्रैल 2026 तक तीर्थराज पुष्कर की मणिवैदिका पीठ में 100 पुरश्चरणों का एक विशाल अनुष्ठान आयोजित किया जाएगा, जिसमें 24 करोड़ गायत्री मंत्रों का जप किया जाएगा।

शास्त्रों में पुरश्चरण का विशेष महत्व है, जिसमें चौबीस लाख विशिष्ट मंत्रों का जप किया जाता है। इस विशाल अनुष्ठान में 200 कुण्डीय हवन भी किया जाएगा, जिसका लक्ष्य विश्व कल्याण और जीव मात्र का हित है।

यज्ञ सम्राट स्वामी प्रखरजी महाराज ने श्रीडूंगरगढ़ क्षेत्र के विप्र समाज को इस अनुष्ठान में भाग लेने और दर्शन करने के लिए पुष्कर आने का आमंत्रण दिया है। उन्होंने जप और यज्ञ में सक्रिय रूप से योगदान करने का भी आह्वान किया।

विप्र फाउंडेशन के तत्वावधान में मंगलवार शाम को आड़सर बास के माताजी मंदिर में एक बैठक आयोजित की गई, जहाँ स्वामी प्रखर जी महाराज ने धर्म आचरण और शास्त्रोक्त प्रवचन दिए।

सूत्रों के अनुसार, स्वामी प्रखर जी महाराज के मंदिर पहुंचने पर पालिकाध्यक्ष मानमल शर्मा, विप्र फाउंडेशन के जिला महामंत्री आईदान पारीक धनेरू, तहसील अध्यक्ष एडवोकेट प्रवीण पालीवाल, पं. कैलाश आसोपा, ओमप्रकाश पुजारी, ऋषिकुल संस्कृत विद्यालय के प्रधानाचार्य गोविन्द पारीक, समाजसेवी रामदेव बोहरा, आनंद जोशी, जगदीश कुदाल, अशोक व्यास, गजानंद शर्मा धीरदेसर, श्याम पालीवाल, पवन उपाध्याय, रजत आसोपा, मूलचंद पालीवाल, मघराज तिवारी, रामसिंह राजपुरोहित, राम छंगाणी, नंदू छंगाणी, बनवारीलाल पलोड, रमेश व्यास, गोविंद व्यास, दीनदयाल जोशी, छगनलाल पलोड, हुलासमल सिखवाल, पोकरमल तावनियां, और महावीर सारस्वत ने पुष्पहारों से उनका स्वागत किया।

बैठक में आड़सर बास, कालूबास, मोमासर बास, बिग्गाबास और आसपास के गांवों के विप्रजन शामिल हुए।

बैठक के बाद, महाराज आईदान पारीक धनेरू के घर भी गए और उनके परिवार को धर्म के मार्ग पर चलने और जीवन पर्यंत धर्म का पालन करने की प्रेरणा दी। परिवार ने महाराज से मिलकर उनका आभार व्यक्त किया।

इस विशाल जप अनुष्ठान की घोषणा ऐसे समय में हुई है, जब दुनिया को शांति और सद्भाव की सख्त ज़रूरत है। यह अनुष्ठान न केवल आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह मानवता के लिए आशा की किरण भी है।

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