गाँव कितासर की रोही में माताजी दिखणादा फीडर के पास दिवंगत बुधाराम बावरी की पत्नी बुलीदेवी के खेत में जर्जर हालत में मौजूद बिजली के खंभे धराशायी हो गए। बताया जाता है कि लगभग आधा दर्जन खंभे खेत में गिरे और बिजली की तारें लगभग 20 मिनट तक जीवित रहीं, जिनमें करंट दौड़ता रहा।
इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना में बुलीदेवी की चार बकरियाँ और एक बैल, जो उनकी गाड़ी खींचने के काम आता था, करंट की चपेट में आकर काल के गाल में समा गए। बुलीदेवी, जो अपने तीन नाबालिग बच्चों का पालन-पोषण इन्हीं पशुओं के सहारे करती थीं, गहरे सदमे में हैं। उन्होंने बताया कि अब उनके सामने आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
पड़ोसी आदुराम मेघवाल ने तत्काल सरपंच, विभागीय अधिकारियों और पुलिस को सूचित किया। आसपास के ग्रामीणों ने प्रशासन से बुलीदेवी की हर संभव मदद करने की गुहार लगाई है।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने पिछले दो वर्षों में कई बार विद्युत विभाग को इन जर्जर खंभों की जानकारी दी थी, लेकिन विभाग ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। ग्रामीणों के अनुसार, लाइन में खराबी आने पर बिजली को स्वचालित रूप से बंद हो जाना चाहिए था, लेकिन जीएसएस पर ऑटोमेटिक सिस्टम के खराब होने के कारण ऐसा नहीं हो पाया। पड़ोसियों ने विभाग को सूचित कर बिजली आपूर्ति बंद करवाई।
विद्युत निगम के कर्मचारी सुनील शर्मा ने बताया कि उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण कर रिपोर्ट तैयार कर ली है, जिसे वे जल्द ही विभागीय अधिकारियों को सौंप देंगे। उन्होंने बताया कि कृषि लाइन में ऑटोमेटिक सिस्टम इसलिए नहीं लगाया जाता क्योंकि वोल्टेज में उतार-चढ़ाव होने पर बिजली बार-बार कट जाती है, जिससे किसानों को परेशानी होती है। इस मामले में भी अधिकारियों को जानकारी दे दी जाएगी।
इस घटना ने एक बार फिर विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को उजागर कर दिया है। यह देखना होगा कि प्रशासन और विद्युत विभाग इस संकट की घड़ी में बुलीदेवी और उनके परिवार को किस प्रकार सहारा देते हैं और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाते हैं। यह घटना निश्चित रूप से हम सभी को सोचने पर मजबूर करती है कि क्या विकास की दौड़ में हम सबसे कमजोर और ज़रूरतमंद लोगों को पीछे छोड़ रहे हैं?