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लिखमादेसर से सालासर के लिए पैदल यात्री संघ रवाना

डूंगरगढ़, 2 अक्टूबर, 2025। श्रीडूंगरगढ़ के ग्राम लिखमादेसर में गुरुवार का दिन भक्ति और श्रद्धा के रंग में डूबा हुआ था। यहां से सालासर धाम के लिए पैदल यात्रियों का एक जत्था रवाना हुआ। यह कोई साधारण प्रस्थान नहीं था, बल्कि आस्था का एक भव्य कारवां था, जो हर साल इसी श्रद्धा और उत्साह के साथ अपनी मंज़िल की ओर बढ़ता है।

गाँव के ठाकुरजी मंदिर के प्रांगण में सुबह से ही चहल-पहल थी। मंगलाचरण और भजन-कीर्तन से वातावरण भक्तिमय हो गया था। इसके बाद, यात्रियों ने श्री हंसोजी धाम में दर्शन-पूजन किया और यात्रा की निर्विघ्न पूर्णता के लिए आशीर्वाद प्राप्त किया।

पंडित बजरंग लाल पारीक, जो इस संघ के संचालक हैं, ने बताया कि यह यात्रा पिछले सत्रह वर्षों से अनवरत जारी है। इस बार 125 श्रद्धालु इस पैदल यात्रा में शामिल हुए हैं। यह संख्या हर साल बढ़ती जा रही है, जो लोगों की अटूट श्रद्धा का प्रमाण है।

जब यात्रियों ने गाँव से प्रस्थान किया, तो दृश्य अत्यंत मनमोहक था। ग्रामीणों ने पुष्प वर्षा कर यात्रियों का उत्साहवर्धन किया। जयकारों और मंगल गीतों से वातावरण गुंजायमान था। हर कोई यात्रियों को शुभकामनाएँ दे रहा था, मानो पूरा गाँव इस पुण्य यात्रा में उनके साथ चल रहा हो।

यह यात्रा कुल चार दिनों तक चलेगी। रास्ते में निर्धारित स्थानों पर यात्रियों के विश्राम, भोजन और भजन-कीर्तन की व्यवस्था की गई है। यात्री पूरे अनुशासन और श्रद्धा के साथ भक्ति गीत गाते हुए अपनी मंज़िल की ओर बढ़ रहे हैं। उनकी आँखों में सालासर धाम पहुँचने की आस है, और हृदय में हनुमान जी के प्रति अटूट श्रद्धा।

बताया गया है कि सालासर धाम पहुँचने पर हवन-पूजन, भजन संध्या और विशाल भंडारे का आयोजन किया जाएगा, जिसमें सभी श्रद्धालु शामिल होंगे। यह आयोजन न केवल धार्मिक महत्व का होगा, बल्कि आपसी मेल-जोल और भाईचारे का भी प्रतीक होगा।

इस अवसर पर बजरंगलाल जोशी, विश्वनाथ ज्याणी, भींवाराम ज्याणी, गोविंद पारीक, केसराराम सुथार, लालनाथ महिया, पवन सिद्ध, दुलनाथ गोदारा सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे, जो इस यात्रा के साक्षी बने और उन्होंने यात्रियों को अपनी शुभकामनाएँ दीं।

कुल मिलाकर, प्रस्थान का पूरा माहौल भक्ति और उल्लास से सराबोर था। यह एक ऐसा अनुभव था जो हर यात्री के मन में हमेशा के लिए अंकित हो गया। यह यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह आस्था, समर्पण और सामुदायिक भावना का एक जीवंत उदाहरण है।

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