श्रीडूंगरगढ़ की शांत गलियों में एक फैसले की गूंज सुनाई दी है। अपर सत्र न्यायालय की जज सरिता नौशाद ने एक ऐसे मामले में अपना फैसला सुनाया है, जो वर्षों से इंसाफ की आस लगाए बैठा था। 12 साल पहले हुए एक हत्या के मामले में, कुंतासर निवासी अमराराम पुत्र दुलाराम को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है, साथ ही उन पर ₹30,000 का अर्थदंड भी लगाया गया है।
न्यायालय ने इस फैसले को सुनाते हुए कहा कि हत्या एक ऐसा अपराध है जो समाज के मूल सिद्धांतों को हिला देता है। न्यायाधीश महोदया ने अभियुक्त के कृत्य को मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक मूल्यों के खिलाफ बताया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अपराधियों को दंडित न करने से अन्याय को बढ़ावा मिलेगा और समाज में अपराध करने वालों को प्रोत्साहन मिलेगा।
यह मामला 30 जुलाई 2013 का है, जब कुंतासर निवासी आदूराम पुत्र कानाराम ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने बताया था कि उनका भतीजा मुनीराम 29 जुलाई की सुबह खेत में काम करने गया था, लेकिन बाद में उसका शव वहीं मिला। मुनीराम के शरीर पर जलने के निशान थे।
जांच में पता चला कि मुनीराम को शराब में जहर मिलाकर मारा गया था। आरोपी ने घटना को छुपाने और खुद को निर्दोष साबित करने की हर संभव कोशिश की थी।
अपर लोक अभियोजक सोहन नाथ सिद्ध ने न्यायालय में 21 गवाहों और 16 साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को कड़ी सजा देने की मांग की। परिवादी के अधिवक्ता अबरार मोहम्मद ने भी अपना पक्ष रखा। सभी दलीलों और साक्ष्यों को सुनने के बाद, न्यायाधीश सरिता नौशाद ने अमराराम को आजीवन कारावास और अर्थदंड की सजा सुनाई।
यह फैसला बताता है कि न्याय की प्रक्रिया भले ही धीमी हो, लेकिन सत्य और न्याय की राह पर चलने वालों को अंततः सफलता मिलती ही है। यह उन लोगों के लिए भी एक सबक है जो अपराध करके बच निकलने की सोचते हैं। यह फैसला न्याय के प्रति लोगों के विश्वास को और मजबूत करता है।