बरखा की फुहारों के बीच आयोजित समारोह में, साहित्य जगत के इस सितारे को एक लाख रुपये की नकद राशि, शॉल, श्रीफल और प्रशस्ति पत्र भेंट कर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में नगर के अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
इस अवसर पर भाषा मान्यता आंदोलन के प्रति गहरा चिंतन और चिंता व्यक्त की गई।
समारोह की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार श्याम महर्षि ने कहा कि राजस्थान आज भी अपने पहले मुख्यमंत्री की उस भूल की सजा भुगत रहा है, जिसके कारण राजस्थानी भाषा को अब तक मान्यता नहीं मिल पाई है। उन्होंने यह भी कहा कि राजनेताओं की इच्छाशक्ति में कमी के कारण यह मामला अटका हुआ है। यदि मुख्यमंत्री चाहें तो कुछ ही दिनों में राजस्थानी को राजभाषा बना सकते हैं।
समिति के अध्यक्ष लॉयन महावीर माली ने भाषा और संस्कृति के अटूट संबंध को रेखांकित करते हुए कहा कि भाषा एक दर्पण है, जिसमें संस्कृति का चेहरा झलकता है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि भाषा के लुप्त होने से संस्कृति और परंपराएं भी समाप्त हो जाएंगी। उन्होंने नेताओं को राजस्थानी भाषा में घोषणाएं और भाषण करने के लिए बाध्य करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
सम्मानित साहित्यकार मनोज स्वामी ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि आज हर राजस्थानी की सबसे बड़ी लड़ाई अपनी भाषा के लिए है। उन्होंने आगामी जनगणना में अपनी मातृभाषा राजस्थानी दर्ज कराने का आह्वान किया और बताया कि वे जमीनी स्तर पर भाषा आंदोलनकारियों को तैयार कर रहे हैं।
विभिन्न विद्वानों ने भी इस अवसर पर अपने विचार रखे। डॉ. मदन सैनी ने कहा कि सरकार ऐसा व्यवहार कर रही है जैसे भाषा आंदोलन का उस पर कोई असर नहीं हो रहा है। कथाकार सत्यदीप ने राजनेताओं को भाषा के बारे में बात करने और राजस्थानी में ही बात करने के लिए बाध्य करने की बात कही। युवा साहित्यकार गौरीशंकर निमिवाल ने गांव-कस्बों के युवाओं को भाषा आंदोलन से जोड़ने की आवश्यकता बताई। मुरलीधर उपाध्याय ने भाषा को मान्यता दिलाने और राजभाषा के रूप में लागू करवाने के लिए हर परिवार को एकजुट होने का आह्वान किया। कार्यक्रम के संयोजक डॉ. चेतन स्वामी ने कहा कि भौतिक स्वतंत्रता से कहीं अधिक कठिन है भाषा की स्वतंत्रता।
इसी बीच, गर्भस्थ शिशु संरक्षण समिति, श्रीडूंगरगढ़ ने भी मनोज स्वामी को सम्मानित किया। समिति के अध्यक्ष वसत्यनारायण स्वामी, मंत्री मनोज डागा, रामावतार मुन्धड़ा, और दीनदयाल व्यास ने उन्हें प्रशस्ति पत्र भेंट किया।
इस समारोह ने एक बार फिर राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने के आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की और साहित्यकारों, भाषा प्रेमियों को एकजुट होकर इस दिशा में प्रयास करने के लिए प्रेरित किया।