राजस्थान में ग्राम पंचायतों और निकायों के चुनाव को लेकर एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एकलपीठ के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें चुनाव जल्द करवाने और करीब डेढ़ दर्जन प्रशासकों को पद से हटाने पर रोक लगाने की बात कही गई थी।
जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने यह निर्देश राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए दिया। सरकार की ओर से पेश हुए अधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद और कपिलप्रकाश माथुर ने न्यायालय को बताया कि एकलपीठ में जो याचिकाएँ दायर की गई थीं, उनमें केवल प्रशासकों के निलंबन और बर्खास्तगी को ही चुनौती दी गई थी। उन्होंने कहा कि ग्राम पंचायतों और निकायों के चुनाव जल्द करवाने की कोई विशेष प्रार्थना याचिका में नहीं की गई थी।
अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि इस समान मुद्दे और परिसीमन मामले में दायर एक जनहित याचिका पर खंडपीठ ने पहले से ही फैसला सुरक्षित रख रखा है। ऐसे में एकलपीठ को पंचायतों और निकायों के चुनाव जल्द करवाने का आदेश देना उचित नहीं था। उन्होंने खंडपीठ से एकलपीठ के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगाने का आग्रह किया।
राज्य सरकार की दलील सुनने के बाद खंडपीठ ने एकलपीठ के 18 अगस्त के आदेश के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी। सरकार की अपील में यह भी कहा गया है कि पूर्व में पंचायतों के चुनाव तीन चरणों में हुए थे, जिसके कारण संबंधित सरपंचों का कार्यकाल भी अलग-अलग समय पर पूरा हो रहा है।
इस निर्णय के बाद, प्रदेश में ग्राम पंचायत और निकाय चुनाव को लेकर स्थिति और भी जटिल हो गई है। अब सबकी निगाहें हाईकोर्ट की खंडपीठ पर टिकी हैं, जो इस मामले में आगे की सुनवाई करेगी और अंतिम फैसला सुनाएगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि न्यायालय इस मामले में क्या रुख अपनाता है और इसका प्रदेश की राजनीति और आम जनता पर क्या प्रभाव पड़ता है। यह घटनाक्रम निश्चित रूप से प्रदेश में स्थानीय स्वशासन की दिशा और दशा को प्रभावित करेगा।