सरकार ने अगस्त और सितंबर में लगभग पांच हजार से अधिक प्राचार्यों का स्थानांतरण तो कर दिया, लेकिन छह महीने पहले पदोन्नत हुए 4224 प्राचार्य आज भी अपनी नई जगह पर कार्यभार संभालने की राह देख रहे हैं।
स्थिति यह है कि ये सभी शिक्षक अब भी अपने पुराने विद्यालयों में उप-प्राचार्य के पद पर ही कार्यरत हैं, जबकि कागजों में उन्हें “यथास्थान कार्यग्रहण” दिखाकर प्राचार्य बना दिया गया है। पदोन्नति तो हो गई, लेकिन जिम्मेदारी और दायित्व का पद अब तक नसीब नहीं हुआ।
शिक्षा विभाग ने 26 मई को दो वर्षों से लंबित विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) का आयोजन किया था, जिसमें 4224 उप-प्राचार्यों को प्राचार्य के पद पर पदोन्नत किया गया। पर विडंबना यह रही कि पदस्थापन मिलने से पहले ही 300 से अधिक प्राचार्य सेवानिवृत्त हो गए।
ऐसे विद्यालय भी हैं, जहां चार से पांच उप-प्राचार्य एक साथ प्राचार्य के रूप में पदोन्नत हुए, लेकिन सरकार ने इन्हें नई जगह भेजने की बजाय स्थानांतरण सूची पर ध्यान केंद्रित किया।
नए शिक्षा सत्र के आरंभ के बाद सरकार ने दो बार प्राचार्यों का स्थानांतरण किया। पहली सूची 3 अगस्त को जारी हुई, जिसमें 509 प्राचार्यों का स्थानांतरण हुआ। इसके बाद 26 सितंबर को दूसरी सूची में 4527 प्राचार्यों का स्थानांतरण किया गया।
सूत्रों के अनुसार, लगभग 700 प्राचार्यों की संशोधित सूची अभी प्रक्रियाधीन है, जिसे जारी करने में विलंब हो रहा है। विभागीय सूत्रों की मानें तो यही देरी पदोन्नत प्राचार्यों के पदस्थापन को रोकने का बड़ा कारण बनी हुई है।
यह विडंबना यहीं तक सीमित नहीं है। 26 सितंबर की डीपीसी में पदोन्नत हुए 11 हजार से अधिक उप-प्राचार्य भी पदस्थापन का इंतजार कर रहे हैं। इन्हें भी “यथास्थान कार्यग्रहण” करवा दिया गया है।
नियमानुसार, जब तक पदोन्नत हुए प्राचार्य अपनी नई जगह पर कार्यभार नहीं संभालते, तब तक उप-प्राचार्य के पद औपचारिक रूप से रिक्त नहीं माने जाएंगे। इसी कारण उप-प्राचार्यों की पदस्थापन प्रक्रिया भी ठप पड़ी है।
ऐसे में, शिक्षा विभाग की यह उलझन न केवल पदोन्नत शिक्षकों के लिए निराशाजनक है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के सुचारू संचालन पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। अब देखना यह है कि यह पदोन्नति का चक्रव्यूह कब टूटता है और शिक्षकों को उनका वास्तविक अधिकार कब मिलता है।