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हाईकोर्ट ने कहा- गलत जांच के आधार पर हुई कार्रवाई, मृतक जज बीडी सारस्वत की बर्खास्तगी रद्द, परिवार को मिलेगा रिटायरमेंट तक पूरा वेतन और सभी लाभ

जस्टिस मुजूरी लक्ष्मण और जस्टिस बिपिन गुप्ता की डिवीजन बेंच ने 3 नवंबर, 2025 को सुनाए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि बीडी सारस्वत के पास आरोपी को वैधानिक जमानत देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। ऐसे में उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करना न्यायसंगत नहीं था।

अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि दिवंगत जज को “काल्पनिक रूप से बहाल” माना जाएगा और उनकी बर्खास्तगी की तारीख, 8 अप्रैल 2010 से लेकर उनकी सेवानिवृत्ति की तारीख, 28 फरवरी 2011 तक का पूरा वेतन और सभी पेंशन लाभ उनके परिवार को दिए जाएं।

यह फैसला दिवंगत बीडी सारस्वत के परिवार के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया है, जिन्होंने पिछले 15 सालों से कानूनी लड़ाई लड़ी।

बीडी सारस्वत प्रतापगढ़ में एनडीपीएस एक्ट के विशेष न्यायालय में स्पेशल जज के पद पर कार्यरत थे। साल 2004-05 में, उन्होंने एक आरोपी पारस को जमानत दी थी, जिसके बाद उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई। आरोप था कि उन्होंने अवैध उद्देश्यों से आरोपी की तीसरी जमानत याचिका मंजूर की थी।

तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के आदेश पर इस मामले की जांच शुरू हुई थी। जस्टिस एनपी गुप्ता ने जांच रिपोर्ट में सारस्वत को दोषी ठहराया था। इसके बाद, फुल कोर्ट ने 2010 में उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश की, जिस पर राज्यपाल ने अपनी मुहर लगा दी थी।

बीडी सारस्वत का 26 मई 2012 को निधन हो गया। इसके बाद उनकी पत्नी, बेटी मधु सारस्वत और बेटे अमित सारस्वत (जो बीकानेर के जय नारायण व्यास कॉलोनी के निवासी हैं) ने इस कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ाया।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि जांच अधिकारी ने मामले की जांच में गलत साक्ष्यों पर भरोसा किया।

अदालत ने कहा कि आरोपी पारस के खिलाफ मामला 1.5 किलो अफीम की बरामदगी से जुड़ा था, जो मध्यवर्ती श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों में अधिकतम सजा 10 साल तक की हो सकती है। दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 167(2) के तहत, 10 साल तक की सजा वाले अपराधों में यदि 90 दिन की हिरासत के बाद चार्जशीट दाखिल नहीं होती है, तो आरोपी को “वैधानिक जमानत” का अधिकार होता है।

इस मामले में, आरोपी की तीसरी जमानत याचिका ऐसे ही वैधानिक आधार पर दायर की गई थी। उस समय आरोपी 157 दिनों से जेल में था और चार्जशीट भी दाखिल नहीं हुई थी। इसलिए, अदालत ने माना कि सारस्वत द्वारा आरोपी को जमानत देना कानूनन सही था।

बेंच ने यह भी कहा कि जांच अधिकारी ने अन्य मामलों, रमेश और अयूब की जमानत के आदेशों को भी इस मामले का आधार बनाया, जबकि वे मामले इस आरोप का हिस्सा ही नहीं थे।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एम.एस. सिंघवी ने अदालत में दलील दी कि बीडी सारस्वत ने 5 फरवरी 2010 को इस मामले में अपना जवाब दाखिल किया था, लेकिन फुल कोर्ट ने इससे पहले ही, 2 फरवरी को उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश कर दी थी।

कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए माना कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन था, क्योंकि याचिकाकर्ता को अपनी बात रखने और सुनवाई का पूरा मौका नहीं मिला।

हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद बीडी सारस्वत की बर्खास्तगी रद्द मानी जाएगी। राज्य सरकार को आदेश दिया गया है कि उनके परिवार को उनकी सेवानिवृत्ति तक का पूरा वेतन, पेंशन और अन्य सभी सेवा लाभ दिए जाएं।

यह फैसला न्यायपालिका में पारदर्शिता और निष्पक्षता के महत्व को रेखांकित करता है। साथ ही, यह उन सभी लोगों के लिए एक उम्मीद की किरण है जो न्याय के लिए लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं। यह मामला याद दिलाता है कि न्याय देर से मिले, पर मिलना ज़रूरी है।

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