मामले की शुरुआत में, टेंडर के लिए पांच साल के अनुभव की शर्त रखी गई थी। किसानों की सहूलियत को ध्यान में रखते हुए, इसे घटाकर दो साल कर दिया गया। लेकिन, विडंबना यह रही कि दो साल के अनुभव वाले टेंडर भी नहीं आए। जानकार बताते हैं कि शर्तों का पालन न होने का खामियाजा सीधे तौर पर बीकानेर जिले के किसानों को भुगतना पड़ सकता है।
गौरतलब है कि यह बदलाव इसी वित्तीय वर्ष की निविदाओं की शर्तों में किया गया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद की तारीख नज़दीक आ रही है, लेकिन बीकानेर, लूणकरणसर और श्रीडूंगरगढ़ क्रय विक्रय सहकारी समितियों के खरीद केंद्रों पर हैंडलिंग और परिवहनकर्ताओं की नियुक्ति अब तक अधर में लटकी हुई है।
जानकारों की मानें तो सहकारिता विभाग के प्रयास अभी तक नाकाफी साबित हुए हैं। जब तक समितियों में हैंडलिंग और परिवहनकर्ता की नियुक्ति नहीं हो जाती, तब तक समर्थन मूल्य पर खरीद कार्य शुरू करना संभव नहीं है। सवाल यह उठता है कि यदि अधिकारी खरीद कर भी लेते हैं, तो खरीदी हुई फसल को सुरक्षित कैसे रखा जाएगा? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब फिलहाल विभाग के आला अफसरों के पास नहीं है।
जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते इन टेंडरों को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो समर्थन मूल्य पर तय समय पर खरीद करना मुश्किल हो जाएगा। इस गंभीर विषय पर विभागीय स्तर पर ठोस कदम न उठाया जाना, सहकारिता विभाग की एक बड़ी लापरवाही के तौर पर देखा जा रहा है। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद पूरी तरह से इन्हीं टेंडरों पर टिकी हुई है।
कुछ हलकों में यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि जानबूझकर ऐसी शर्तें जोड़ी गई हैं ताकि टेंडर ही न हो पाएं और अंतिम समय में आनन-फानन में चहेतों को ठेके देकर काम करवाया जा सके।
इस पूरे मामले पर सहकारिता विभाग के उप रजिस्ट्रार कैलाश चंद्र सैनी का कहना है कि टेंडर की शर्तों के अनुसार फर्में नहीं मिल पाईं। उन्होंने यह भी कहा कि उनका काम टेंडर करवाना है और अब आगे का काम राजफैड के हाथ में है। उनके अनुसार, दोबारा टेंडर भी किया जा सकता है।
अब देखना यह है कि राजफैड इस मामले में क्या कदम उठाता है और किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के लिए क्या प्रयास किए जाते हैं। यह मामला निश्चित रूप से किसानों और सहकारिता विभाग के बीच एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है।