स्वामी भास्करानंदजी महाराज ने आज महारास प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए इसके सूक्ष्म अर्थ और मर्म को समझाया। उन्होंने कहा कि रास आत्मा और परमात्मा के मिलन की एक दिव्य घटना है। यह एक ऐसा क्षण है जब भक्त और भगवान एक हो जाते हैं। उन्होंने आगे कहा कि महारास के दर्शन आज भी सच्चे भक्तों को हो सकते हैं, लेकिन इसके लिए काल और दृष्टि से परे एक भगवत प्रेमी बनना होगा। उन्होंने भजन के माध्यम से भगवान में मन लगाने की क्रिया का अभ्यास करने का महत्व बताया।
अपने प्रवचन में, स्वामी जी ने संत तुलसीदास, सूरदास, कबीर, मीरा बाई और नरसी मेहता जैसे महान भक्तों के भक्तिमय जीवन के उदाहरण दिए। उन्होंने रावण प्रसंग का उल्लेख करते हुए अधर्म को सदैव अस्वीकार करने की प्रेरणा दी और कामदेव के अहंकार के मर्दन की कथा सुनाई।
आज के युग में मोबाइल के बढ़ते उपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए, स्वामी जी ने इसे एक “भूत” बताया जो किसी को चैन से नहीं बैठने देता। उन्होंने श्रोताओं को सलाह दी कि भजन और कथा के दौरान मोबाइल बंद करके भगवान का गुणगान श्रवण करना चाहिए। उन्होंने भक्तों को हर पल अपने मन में “हे मेरे नाथ मैं तुम्हें भूलूं नहीं” की रटन करने की बात कही।
कृष्ण लीलाओं का वर्णन करते हुए, स्वामी जी ने रुक्मणी विवाह प्रसंग का विस्तृत वर्णन किया। इस अवसर पर रुक्मणी कृष्ण विवाह की एक सुंदर झांकी भी सजाई गई, जिसने सभी का मन मोह लिया। भजनों पर जयकारे लगाते हुए श्रद्धालु खूब झूमे और आनंदित हुए। कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए और भक्ति के रंग में रंग गए।