श्रीडूंगरगढ़, 15 नवंबर, 2025। राजकीय विधि स्नातकोत्तर महाविद्यालय, श्रीडूंगरगढ़ में आज एक विशेष अवसर था। जनजाति गौरव दिवस और भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में महाविद्यालय परिसर विद्यार्थियों के उत्साह से गुलजार था।
प्राचार्य प्रो. भगवाना राम विश्नोई की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। यह आयोजन न केवल भगवान बिरसा मुंडा के त्याग और बलिदान को याद करने का दिन था, बल्कि आदिवासी संस्कृति और विरासत के प्रति सम्मान व्यक्त करने का भी अवसर था।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता, राजकीय डूंगर महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य प्रो. दिग्विजय सिंह शेखावत ने अपने प्रेरक व्याख्यान में बिरसा मुंडा के जीवन के संघर्षों को जीवंत कर दिया। उन्होंने बताया कि बिरसा मुंडा के गुरु जयपाल नाग थे और शिक्षा के प्रति उनका गहरा लगाव था। प्रो. शेखावत ने श्रोताओं को यह भी बताया कि बिरसा मुंडा सदैव अपने साथ रामायण और गीता रखते थे, जो उनके विचारों और जीवन दर्शन को दर्शाती हैं।
प्रो. शेखावत ने बिरसा मुंडा द्वारा औषधीय पौधों के उपयोग को बढ़ावा देने, आदिवासी भूमि की रक्षा करने, और जन-जागरण आंदोलनों में उनके योगदान को विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि बिरसा मुंडा की जुझारू नेतृत्व क्षमता के कारण ही उन्हें ‘धरती आबा’ और ‘पूर्व गांधी’ के नाम से जाना जाता है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि 1908 में उनके निधन के बाद भी, उनके प्रयासों से आदिवासियों के हक में कई कानून बने, जो आज भी उनके योगदान की गवाही देते हैं।
इस अवसर पर विद्यार्थियों के लिए निबंध, चित्रकला और भाषण प्रतियोगिताएँ आयोजित की गईं, जिनमें उन्होंने पूरे उत्साह के साथ भाग लिया। विजेताओं को प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम के दौरान प्राचार्य ने ऑनलाइन माध्यम से महाविद्यालय के सदस्यों और विद्यार्थियों से संवाद किया और जनजाति गौरव दिवस के महत्व पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. मीनाक्षी कुमावत ने किया और प्रो. कुमुद जैन ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। कार्यक्रम का समापन सामूहिक रूप से ‘वंदे मातरम’ के वाचन के साथ हुआ, जिसने सभी को देशप्रेम की भावना से सराबोर कर दिया।