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मालीराम शर्मा जन्म शताब्दी समारोह सम्पन्न, चार अप्रकाशित कृतियों का लोकार्पण, विद्वानों ने रखे विचार

कार्यक्रम की शुरुआत उनकी चार अप्रकाशित कृतियों के लोकार्पण के साथ हुई। साहित्य जगत के विद्वानों ने उनकी रचनाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला और उनके योगदान को याद किया।

महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के कुलगुरु आचार्य मनोज दीक्षित ने समारोह का उद्घाटन करते हुए कहा कि व्यंग्य लेखन साहित्य की सबसे कठिन विधा है। उन्होंने रेखांकित किया कि मालीराम शर्मा जैसे विलक्षण प्रतिभा के धनी साहित्यकार ही इसे साध सकते हैं। आचार्य दीक्षित ने हास्य और व्यंग्य के बीच का सूक्ष्म अंतर बताते हुए कहा कि हास्य जहाँ गुदगुदाने का काम करता है, वहीं व्यंग्य समाज की विसंगतियों पर सीधा प्रहार करता है। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि शर्मा जी ने कभी भी व्यक्तिगत आक्षेपों का सहारा नहीं लिया, बल्कि हमेशा सामाजिक प्रवृत्तियों पर चोट की, जो उन्हें अन्य व्यंग्यकारों से अलग करता है।

राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के पूर्व अध्यक्ष श्याम महर्षि ने समारोह की अध्यक्षता की। उन्होंने कहा कि मालीराम शर्मा का लेखन आम आदमी के जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ था। उन्होंने याद दिलाया कि जब जनता ने उन्हें अपने गाँव का सरपंच चुना, तो वे राजस्थान के सबसे शिक्षित और प्रबुद्ध सरपंच बने।

इस अवसर पर व्यंग्य उपन्यास ‘काकभुशुण्डि ने कहा’, व्यंग्य संग्रह ‘अश्वमेघी रचनाएं’ तथा संस्मरणात्मक पुस्तकें ‘सफरनामा’ और ‘यादों के दायरे’ का लोकार्पण किया गया।

पूर्व मंत्री और उपन्यासकार बाबू खांडा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि बीकानेर का साहित्यिक परिदृश्य बीसवीं सदी के आठवें दशक में पूरे देश में अपनी पहचान बना चुका था। मालीराम शर्मा ने ग्राम्य जीवन से लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी लेखनी चलाई और देश के महत्वपूर्ण व्यंग्यकारों में अपना स्थान बनाया।

वरिष्ठ नाट्य निर्देशक अशोक राही ने मालीराम शर्मा के आत्मकथात्मक उपन्यास ‘ओ सत्तासर’ को कालजयी कृति बताते हुए कहा कि इसमें गाँव से शहर की ओर पलायन की त्रासदी को इतनी मार्मिकता से चित्रित किया गया है कि पाठक सहज ही भावुक हो उठता है। शिक्षाविद् डॉ. उमाकांत गुप्त ने उन्हें न केवल एक व्यंग्यकार, बल्कि एक सामाजिक चिंतक के रूप में भी याद किया, जबकि वरिष्ठ कवि रवि पुरोहित ने कहा कि देश-विदेश की यात्राओं के बावजूद उनके मन में हमेशा गाँव और उसकी मिट्टी बसी रही।

समारोह का दूसरा सत्र ‘मालीराम शर्मा सृजन–विमर्श एवं समाहार’ शीर्षक से आयोजित किया गया, जिसकी अध्यक्षता डॉ. जयश्री शर्मा ने की। वरिष्ठ साहित्यकार मधु आचार्य आशावादी इस सत्र के मुख्य अतिथि थे। प्रो. आलोक श्रीवास्तव, व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा और कथाकार राजेंद्र जोशी ने भी इस सत्र में अपने विचार रखे। डॉ. जयश्री शर्मा ने घोषणा की कि ‘अनुकृति’ त्रैमासिक पत्रिका का आगामी अंक मालीराम शर्मा के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केंद्रित होगा।

समारोह में शहर के अनेक साहित्यकारों और गणमान्य नागरिकों ने पुष्प अर्पित कर मालीराम शर्मा को श्रद्धांजलि दी। मालीराम शर्मा आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी रचनाएँ हमेशा समाज को आइना दिखाती रहेंगी और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेंगी।

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