यह घटना 2012 में घटी थी, जिसने पूरे क्षेत्र को स्तब्ध कर दिया था। मंदिर, जो सदियों से आस्था का केंद्र रहा है, एक पल में उदासी में डूब गया था। उस समय, ग्रामीणों ने आक्रोश में चक्का जाम किया, हड़तालें कीं, और कई दिनों तक धरने पर बैठे रहे। उनके प्रयासों के फलस्वरूप, प्रशासन ने एक विशेष जांच टीम का गठन किया।
लेकिन, दुर्भाग्यवश, आज तक उस जांच का कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है। सूत्रों के अनुसार, जिन आरोपियों को पुलिस ने पकड़ा था, वे भी जमानत पर बाहर हैं, जिससे लोगों में रोष व्याप्त है।
आज के प्रदर्शन में युवाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। उनका कहना था कि वे इस मामले की तह तक जाना चाहते हैं और दोषियों को सजा दिलवाना चाहते हैं। गांव के बुजुर्गों ने भी अपनी पीड़ा व्यक्त की। उनके अनुसार, यह सिर्फ एक चोरी नहीं है, बल्कि लाखों भैरव भक्तों की आस्था पर एक गहरा आघात है।
प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट रूप से कहा कि उनका विरोध तब तक जारी रहेगा, जब तक मूर्ति बरामद नहीं हो जाती और असली अपराधी पकड़े नहीं जाते। मंदिर परिसर में काला दिवस मनाने का यह सिलसिला अनवरत जारी रहेगा, यह उनकी प्रतिबद्धता का प्रतीक है।
यह घटना न केवल कानून और व्यवस्था का मामला है, बल्कि यह आस्था और न्याय के बीच एक जटिल संबंध को भी दर्शाती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासन और सरकार इस मामले में क्या कदम उठाते हैं और भक्तों की आस्था को कैसे बहाल करते हैं।