यह चार दिवसीय शिविर सात जिलों – चूरू, नागौर, जोधपुर, जैसलमेर, गंगानगर, झुंझुनूं और बीकानेर – की 150 बालिकाओं को एक साथ लाया है। यह एक ऐसा अवसर है जहाँ ये युवतियाँ अपनी संस्कृति की जड़ों को और गहराई से समझने, संस्कारों को आत्मसात करने और समाज में अपनी भूमिका को लेकर सजग होने के लिए एकत्र हुई हैं।
शिविर का संचालन शायर कंवर अवाय (जैसलमेर) के कुशल निर्देशन में हो रहा है। उनके नेतृत्व में बालिकाओं को न केवल अपनी परंपराओं के बारे में जानकारी मिलेगी, बल्कि उन्हें समाज में एक सक्रिय और सकारात्मक भूमिका निभाने के लिए भी प्रेरित किया जाएगा।
स्वागत भाषण में शिविर प्रमुख शायर कंवर अवाय ने कहा, “क्षत्रिय कुल में जन्म लेना सौभाग्य की बात है। देवताओं ने भी इसी परंपरा में क्षत्रिय माता को चुना है।” उन्होंने आगे कहा कि क्षत्रिय युवक संघ, संघप्रमुख लक्ष्मण सिंह बैण्याकाबास के मार्गदर्शन में, हमारी रक्त परंपरा के महत्व और संस्कारों को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने शिविर में बालिकाओं का तिलक लगाकर स्वागत किया और उन्हें चार दिनों के प्रशिक्षण के दौरान जागरूक रहने और समाज को दिशा देने में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि शिविर में जो कुछ भी सीखा जाए, उसे अपने जीवन में उतारना और व्यवहार में लाना ज़रूरी है।
शिविर में मातृशक्ति विभाग प्रमुख जोरावर सिंह भादला का सानिध्य प्राप्त हो रहा है, जो बालिकाओं को मार्गदर्शन और प्रेरणा प्रदान करेंगे। वहीं, श्रीडूंगरगढ़ प्रांत प्रमुख जेठूसिंह पुन्दलसर अपने सहयोगियों के साथ शिविर की व्यवस्था का कुशलतापूर्वक संचालन कर रहे हैं।
यह शिविर न केवल बालिकाओं को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ेगा, बल्कि उन्हें एक सशक्त और जागरूक नागरिक बनने के लिए भी प्रेरित करेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि ये युवतियाँ यहाँ से प्राप्त ज्ञान और अनुभव को अपने जीवन में कैसे उतारती हैं और समाज में क्या बदलाव लाती हैं। निश्चित रूप से, यह शिविर इन बालिकाओं के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित होगा।