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एक सेवादार ऐसा भी, अपनी बेटी के विवाह के दिन भी गौसेवा में हाजिरी दी, बन गए है नि:स्वार्थ गौसेवा के पर्याय

श्रीडूंगरगढ़, 30 अक्टूबर 2025। आज गोपाष्टमी का पावन पर्व है, जो भारतीय संस्कृति में गौमाता के प्रति श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक है। पूरे देश में गौपूजन के आयोजन हो रहे हैं, और इसी अवसर पर श्रीडूंगरगढ़ में एक ऐसे गौ सेवक की कहानी सामने आई है, जो पिछले आठ वर्षों से निस्वार्थ भाव से गौसेवा में लीन हैं।

ये हैं आड़सर बास निवासी हुकुमचंद प्रजापत। वे कस्बे के हनुमान धोरा पर स्थित निराश्रित गौवंश के लिए बनी खुली गौशाला में सुबह-शाम अपनी सेवाएं देते हैं। हुकुमचंद बिना किसी प्रचार-प्रसार के, चुपचाप अपनी सेवा में लगे रहते हैं।

हनुमान धोरा के पुजारी शिवभगवान सिखवाल बताते हैं कि हुकुमचंद अपनी सेवा में इतने समर्पित हैं कि पिछले आठ सालों में उन्होंने रामदेवरा की पदयात्रा के अलावा कभी अवकाश नहीं लिया। यात्रा के दौरान वे अपने पुत्रों को गौशाला की जिम्मेदारी सौंप जाते हैं। सर्दी हो, गर्मी हो या बरसात, हर मौसम में वे नियमित रूप से गौवंश की सेवा करते हैं।

बताया जाता है कि हुकुमचंद टैक्सी से हनुमान धोरा पहुंचते हैं और गौवंश को चारा खिलाने के साथ-साथ पक्षियों के लिए भी चुग्गा डालते हैं। संस्कृत विद्यालय के प्राचार्य गोविंद शर्मा कहते हैं कि हुकुमचंद गौसेवा के प्रति पूरी तरह से निष्ठावान हैं और बिना अवकाश के निस्वार्थ सेवा का एक अनूठा उदाहरण हैं।

गोविंद शर्मा बताते हैं कि आसपास के खेतों से लोग एक-एक झाल चारा दान करते हैं, और कई दानदाता भी गौशाला में चारा पहुंचाते हैं। सूत्रों के अनुसार, कभी-कभी हुकुमचंद अपनी जेब से भी चारा खरीदते हैं।

हुकुमचंद अपने परिवार का पालन-पोषण घर में बनी एक छोटी सी दुकान से करते हैं। उनके दो बेटे हैं, और दोनों ही सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं। हुकुमचंद का कहना है कि बेटों की नौकरी लगने के बाद वे अपना पूरा समय गौसेवा में ही समर्पित कर देंगे। उनकी निष्ठा देखकर आसपास के किसान भी प्रभावित हैं।

यह कहानी हमें याद दिलाती है कि निस्वार्थ सेवा और समर्पण आज भी हमारे समाज में जीवित हैं, और ऐसे लोग ही हमारी संस्कृति और परंपराओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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