श्रीडूंगरगढ़, 4 अक्टूबर 2025। भागदौड़ भरी ज़िंदगी में, कभी-कभी कुछ ऐसी घटनाएं घट जाती हैं जो हमें मानवीयता और रिश्तों की गहराई का एहसास कराती हैं। ऐसी ही एक कहानी श्रीडूंगरगढ़ से सामने आई है, जहाँ एक खोई हुई सोने की अंगूठी, एक महीने बाद अपने सही मालिक तक पहुँच गई।
ये कहानी शुरू होती है 6 सितंबर 2025 को, जब छापर निवासी बुजुर्ग कोजूराम नाई अपने ससुराल, आड़सर बास, गृह प्रवेश के एक कार्यक्रम में शामिल होने आए थे। वहाँ उन्हें सोने की एक अंगूठी पहनाई गई, जो उनके लिए एक अनमोल निशानी बन गई थी।
ससुराल से विदा लेकर, कोजूराम जी टीएम प्लाजा स्थित पतंजलि स्टोर पर कुछ दवाइयाँ लेने गए। यहीं, शायद, वो अनमोल अंगूठी उनके हाथ से फिसल गई। छापर पहुँचने पर उन्हें इस बात का पता चला, पर उन्होंने और उनकी पत्नी ने अपने पीहर में इसका जिक्र नहीं किया।
कुछ दिन बाद, कोजूराम जी के भतीजे, नंदलाल को इस घटना की जानकारी मिली। नंदलाल ने बताया कि दो दिन पहले उनकी मौसी की बेटी से बात करते हुए उन्हें अंगूठी खोने की बात पता चली।
फिर नंदलाल को याद आया कि उन्होंने 9 सितंबर को श्रीडूंगरगढ़ ONE के “खोया-पाया” सेक्शन में समंदसर के रामप्रताप द्वारा एक अंगूठी मिलने की खबर पढ़ी थी। उन्होंने तुरंत उस खबर को दोबारा खोजा और रामप्रताप से संपर्क किया।
शनिवार की सुबह, कोजूराम और नंदलाल टीएम प्लाजा पहुंचे और पुरोषत्तम सोनी की दुकान पर रामप्रताप से मिले। पुरोषत्तम जी ने अंगूठी के मालिक की पूरी तस्दीक की। उन्होंने अंगूठी का वजन, डिज़ाइन और उसे खरीदने वाले सुनार से जानकारी लेकर पूरी तरह सुनिश्चित किया कि अंगूठी सही व्यक्ति को ही लौटाई जा रही है।
तस्दीक होने के बाद, पुरोषत्तम जी ने अंगूठी कोजूराम जी को सौंप दी। बुजुर्ग कोजूराम और युवा नंदलाल दोनों ने रामप्रताप, पुरोषत्तम और श्रीडूंगरगढ़ ONE का आभार व्यक्त किया।
नंदलाल ने कहा कि क्षेत्र में शायद ही कोई ऐसा फोन होगा जिसमें श्रीडूंगरगढ़ ONE न पढ़ा जाता हो और वे स्वयं भी इसकी हर खबर के पाठक हैं। उन्होंने बताया कि श्रीडूंगरगढ़ ONE की सहायता से ही आज उन्हें उनकी अंगूठी मिल पाई है।
कोजूराम जी ने भावुक होते हुए कहा कि उन्हें अंगूठी मिलने की उम्मीद ही नहीं थी। उन्होंने कहा कि आज भी भले लोग नेकी और मानवीयता के कार्य करते हैं, जिससे समाज में मानवता कायम है।
ये कहानी एक छोटी सी अंगूठी के खोने और मिलने की कहानी भर नहीं है, बल्कि ये मानवीय संवेदनाओं, रिश्तों की अहमियत और डिजिटल युग में भी कायम भरोसे की कहानी है। ये कहानी हमें याद दिलाती है कि भले ही दुनिया कितनी भी आधुनिक हो जाए, इंसानियत और मदद करने की भावना आज भी ज़िंदा है।