श्रीडूंगरगढ़, 24 अक्टूबर 2025। “मधुरं वदनं मधुरं नयनं…” इस मधुर संकीर्तन के साथ श्रीडूंगरगढ़ के कालू बास स्थित नेहरू पार्क में शुक्रवार को भक्तिमय भागवत कथा का शुभारंभ हुआ।
कथावाचक महामंडलेश्वर आचार्य स्वामी भास्करानंदजी महाराज ने राजस्थान की महिमा का बखान करते हुए कहा कि यह भूमि पवित्र और पुण्यदायी है। उन्होंने सनातन धर्म के तीन आधार स्तंभों – परमात्मा के भक्त, दानशील व्यक्ति और धर्म की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर करने वाले शूरवीरों – का उल्लेख करते हुए कहा कि ये तीनों ही राजस्थान की धरती पर जन्मे हैं।
स्वामीजी ने क्षेत्र के जनमानस में बसे संत स्वामी रामसुखदासजी महाराज को भी याद किया। उन्होंने कहा कि विश्व वंदनीय संत रामसुखदास जी महाराज, जिनके सनातन धर्म ऋणी है, और गीताप्रेस के हनुमानप्रसाद जी पोद्दार, जयदयाल जी गोयनका जैसे विभूतियों का भगवत कृपा से ही मीरा की इस धरती पर आगमन हुआ।
कथा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए महाराज ने कहा कि श्रद्धा और विश्वास से ही सत्संग प्राप्त होता है, और सत्संग से ही भगवत प्राप्ति संभव है। उन्होंने असुर और सुर के बीच का अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि जो केवल अपने सुख का विचार करे वह असुर है, जबकि वेद कहते हैं कि जो सभी के सुख, निरोग रहने और कल्याण की कामना करता है, वही उत्तम मनुष्य है।
स्वामीजी ने सुख और दुख का कारण घटनाओं को नहीं, बल्कि उनसे हमारे जुड़ाव को बताया। उन्होंने सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग के बारे में भी विस्तार से बताया।
उन्होंने बताया कि प्रयागराज के कुंभ में सीताराम मोहता परिवार द्वारा लिया गया संकल्प आज श्रीडूंगरगढ़ की धरती पर सप्तदिवसीय कथा के रूप में साकार हो रहा है। कथा के दौरान नाम संकीर्तन और सुंदर भजनों का गायन किया गया, जिससे वातावरण भक्तिमय हो गया।
इससे पूर्व, मोहता परिवार के मुख्य यजमान ने कथा और व्यासपीठ का पूजन किया। परिवार के सदस्य कथा की विभिन्न व्यवस्थाओं में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।