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श्रीडूंगरगढ़ में मातृशक्ति प्रशिक्षण शिविर संपन्न, बालिकाओं ने सीखा ‘रील नहीं रियल जीवन जीना’

जैसलमेर से आईं शिविर प्रमुखा शायर कंवर ने बालिकाओं को संबोधित करते हुए कहा कि इन चार दिनों में उन्होंने एक अनुशासित जीवन शैली का अनुभव किया। शिविर में प्रतिदिन प्रातः 4:30 बजे जागरण के साथ दिन की शुरुआत होती थी, जिसमें योगासन, व्यायाम, ध्यान, प्रार्थना और बौद्धिक चर्चाएँ शामिल थीं। मनोरंजक सत्रों ने वातावरण को जीवंत बनाए रखा।

शायर कंवर ने शिविर के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि बालिकाओं को क्षत्रिय कुल की परंपराओं, नारी शक्ति के महत्व, नारी उत्थान और वीरांगनाओं के प्रेरणादायक जीवन से परिचित कराया गया। उन्होंने कहा कि इतिहास इस बात का साक्षी है कि एक बालक के व्यक्तित्व निर्माण में उसकी माता के संस्कारों का सबसे बड़ा योगदान होता है। आज के चुनौतीपूर्ण समय में, समाज के उज्ज्वल भविष्य के लिए वीर और संस्कारवान माताओं का निर्माण आवश्यक है।

शिविर के दौरान बालिकाओं ने मोबाइल और सोशल मीडिया से दूरी बनाकर आत्म-अनुशासन, स्वाध्याय और ध्यान के माध्यम से स्वयं पर ध्यान केंद्रित करना सीखा। उन्हें समाज और देश की वर्तमान परिस्थितियों को समझने और अपने यश-गौरव का समन्वय करने के लिए प्रेरित किया गया। इसके साथ ही क्षात्र धर्म के निर्वहन के महत्व पर भी विस्तार से चर्चा हुई।

पूरे शिविर के दौरान मातृशक्ति विभाग प्रमुख जोरावर सिंह भादला का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। विदाई सत्र में संभाग प्रमुख रेवंतसिंह जाखासर, एडवोकेट भरतसिंह, भागीरथ सिंह सेरूणा, मल्लूसिंह और जयसिंह सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

शिविर को सफल बनाने में प्रांत प्रमुख जेठूसिंह पुंदलसर, गणेश सिंह बीका (श्रीडूंगरगढ़), मांगू सिंह जोधासर, ओमपाल सिंह जोधासर, छोटूसिंह गुसाईंसर, करणीसिंह, संदीपसिंह पुंदलसर और कई अन्य कार्यकर्ताओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।

शायर कंवर ने अपने समापन भाषण में बालिकाओं को प्रेरित करते हुए कहा, “अब समय आ गया है कि हमारी बेटियां रील (virtual life) नहीं, बल्कि रियल जीवन को समझें और वीरता से प्रेरित होकर समाज के पुनर्निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएं।” उनका यह आह्वान, शिविर के उद्देश्य को स्पष्ट रूप से दर्शाता है और बालिकाओं को भविष्य के लिए एक स्पष्ट दिशा प्रदान करता है।

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