श्रीडूंगरगढ़, राजस्थान। गुरुवार का दिन, आस्था और परंपरा के रंग में डूबा हुआ। विश्व हिंदू परिषद (विहिप) और सहयोगी संगठनों ने श्रीडूंगरगढ़ में शस्त्र पूजन का आयोजन किया, वहीं आर्यस्थली गुरुकुल में भी दशहरे के अवसर पर शस्त्रों की आराधना की गई। इन आयोजनों ने एक बार फिर भारतीय संस्कृति में शस्त्रों के महत्व को रेखांकित किया।
गुरुवार शाम को, आसोपा चौक स्थित गुसाईंजी मंदिर में विहिप, बजरंग दल, मातृशक्ति और दुर्गावाहिनी के सदस्यों ने मिलकर शस्त्र पूजन किया। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन से हुई, जिसे संरक्षक भंवरलाल दुगड़, जिलाध्यक्ष जगदीश स्वामी, प्रखंड अध्यक्ष रविकांत सैनी और जिला सहमंत्री वासुदेव सारस्वत ने संयुक्त रूप से किया। पंडित पवन उपाध्याय ने भगवान श्रीराम और माँ दुर्गा की आरती संपन्न कराई, जिसके बाद सत्संग प्रमुख तिलोक प्रजापत ने विजय महामंत्र का उच्चारण किया।
इसके उपरांत, शस्त्रों को रक्त तिलक लगाकर विधिवत पूजा की गई। इस अवसर पर संरक्षक और जिलाध्यक्ष ने भारतीय परंपरा के अनुसार घरों में भी विधि-विधान से शस्त्र पूजन करने के महत्व पर प्रकाश डाला। परिषद के प्रखंड मंत्री दीपक सेठिया ने सभी उपस्थित जनों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में गौ रक्षा प्रमुख भीखाराम सुथार, नगर गौ रक्षा प्रमुख मुकेश प्रजापत, संतोष बोहरा, बजरंग दल सह संयोजक पवन व्यास, मिलन प्रमुख सौरभ दूगड़, बालोपासन प्रमुख मोहित बोरड, मातृशक्ति संयोजिका मीनाक्षी डागा, सह संयोजिका मीना मोरवाणी और दुर्गा वाहिनी सह संयोजिका प्रेक्षा पुगलिया भी उपस्थित थे।
उसी दिन सुबह, आर्यस्थली गुरुकुल, बेनीसर में दशहरे के पर्व पर शस्त्र पूजन का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में विहिप जिलाध्यक्ष जगदीश स्वामी, जिला सहमंत्री वासुदेव सारस्वत, बजरंग दल के जोधपुर प्रांत सुरक्षा प्रमुख और बीकानेर विभाग संयोजक दुर्गासिंह विशेष रूप से उपस्थित थे। दुर्गासिंह ने दशहरे के महत्व पर विस्तार से बताया। पूजन में रोजाड़ (गुजरात) से दर्शनाचार्य उत्तम कुमार और हरियाणा से स्वामी समानानंद सारस्वती भी शामिल हुए, जिन्होंने दशहरे और शस्त्र पूजन के बारे में जानकारी दी।
कार्यक्रम में वेद मंत्रों के साथ हवन किया गया, जिसके बाद शस्त्रों की पूजा की गई। गुरुकुल के बच्चों ने हवन में भाग लिया और योग व्यायाम की प्रस्तुति दी। दयानंद विद्या निकेतन के प्राचार्य विनोद बेनीवाल और बेनीसर गांव से पदमनाथ, उत्तमनाथ और रतननाथ भी पूजन में शामिल हुए। गुरुकुल के संचालक अमित आर्य ने सभी आगंतुकों के प्रति आभार व्यक्त किया।
इन दोनों कार्यक्रमों ने समाज में शस्त्रों के प्रति सम्मान और उनकी पारंपरिक महत्ता को पुनः स्थापित किया। यह आयोजन न केवल धार्मिक अनुष्ठान थे, बल्कि भारतीय संस्कृति और मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का एक प्रयास भी थे।