कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एसपी शर्मा की खंडपीठ ने गुरुवार को यह फैसला सुनाया। यह फैसला गिरिराज सिंह देवंदा और पूर्व विधायक संयम लोढ़ा की जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के बाद आया है, जिसमें सरकार की चुनाव टालने की कार्रवाई को चुनौती दी गई थी।
राज्य में 6,759 पंचायतों और 55 नगरपालिकाओं का कार्यकाल पूरा हो चुका है। इन पंचायतों के पुनर्गठन और परिसीमन से जुड़ी याचिकाओं पर हाई कोर्ट ने पहले ही 12 अगस्त को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। लगभग तीन महीने बाद, कोर्ट ने अब इस मामले पर अपना आदेश जारी किया है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि संविधान चुनावों को टालने की अनुमति नहीं देता है। गिरिराज सिंह देवंदा की ओर से अधिवक्ता प्रेमचंद देवंदा ने कोर्ट में कहा कि राज्य सरकार ने 16 जनवरी, 2025 की अधिसूचना के माध्यम से पंचायत चुनाव स्थगित कर दिए, जो संविधान और राजस्थान पंचायत राज अधिनियम 1994 का उल्लंघन है। अधिवक्ता ने जोर देकर कहा कि जिन पंचायतों का कार्यकाल पूरा हो गया है, उनमें चुनाव किसी भी हालत में टाले नहीं जा सकते। उन्होंने कहा कि निवर्तमान सरपंच अब जनप्रतिनिधि नहीं हैं, और ऐसे में किसी निजी व्यक्ति को प्रशासक बनाना पूरी तरह से अवैध है।
पूर्व विधायक संयम लोढ़ा की याचिका में नगर निकायों के चुनावों को टालने के मुद्दे को उठाया गया था। उनके अधिवक्ता पुनीत सिंघवी ने कहा कि नवंबर 2024 में 55 नगरपालिकाओं का कार्यकाल समाप्त हो गया था, लेकिन सरकार ने नगरपालिका अधिनियम-2009 के खिलाफ जाकर चुनाव नहीं करवाए और बिना अधिकार प्रशासक नियुक्त कर दिए। उन्होंने कोर्ट को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश हैं कि प्राकृतिक आपदा जैसी स्थिति को छोड़कर स्थानीय निकाय चुनाव टाले नहीं जा सकते, लेकिन राज्य सरकार ने संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने में गंभीर लापरवाही की है।
हाई कोर्ट ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि संवैधानिक संस्थाओं के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए कि पंचायत और निकाय चुनाव एक साथ कराए जाएं, और 31 दिसंबर तक परिसीमन का काम हर हाल में पूरा हो। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनावों में देरी की कोई गुंजाइश नहीं है।
हाई कोर्ट के इस फैसले का असर पूरे प्रदेश की स्थानीय शासन व्यवस्था पर पड़ेगा। अब सरकार को तय समयसीमा में दोनों चुनाव करवाने होंगे, जिससे स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बहाल किया जा सके। यह फैसला राज्य की राजनीति और स्थानीय शासन व्यवस्था में एक नए अध्याय की शुरुआत कर सकता है।