महामंडलेश्वर भास्करानंदजी महाराज ने कथा का वाचन करते हुए श्रोताओं को जीवन का सार समझाया। उन्होंने कहा कि कथा का बार-बार श्रवण करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके संदेशों को जीवन में उतारना ही कल्याण का मार्ग है। महाराज जी ने कहा कि सच्ची कथा वही है जो सुनने वाले के मन को पवित्र कर दे और जीवन में हरि प्रेम का संचार करे।
महाराज ने सनातन धर्म के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वेदों के अनुसार जीवन जीना ही सनातन धर्मी होना है। उन्होंने वाणी की शक्ति पर भी बल दिया और व्यर्थ बोलने से अच्छा मौन रहने को श्रेष्ठ बताया। कटु वचनों की निंदा करते हुए, प्रिय और मधुर बोलने को ही जीवन में अपनाने योग्य बताया।
कथा के दूसरे दिन युधिष्ठिर को धर्म का प्रतीक और द्रोपदी को दया की प्रतिमूर्ति बताते हुए, महाराज जी ने विभिन्न कथा प्रसंगों का उल्लेख किया। इन प्रसंगों के माध्यम से उन्होंने जीवन में धर्म, दया और प्रेम के महत्व को समझाया।
शारदा सीताराम मोहता परिवार द्वारा आयोजित इस कथा में दूसरे दिन भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। हर चेहरे पर भक्ति का रंग था और हर हृदय में प्रेम की उमंग। ऐसा लग रहा था मानो श्रीडूंगरगढ़ इन दिनों भक्ति और प्रेम के एक अद्भुत संगम में डूब गया है।