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बालिकाओं ने ली संस्कार व समन्व्य की सीख, ध्वज पूजन के साथ हुआ समापन, शायर कंवर ने दी प्रेरणा।

श्रीडूंगरगढ़ के सेसोमूं स्कूल का प्रांगण रविवार की सुबह एक विशेष ऊर्जा से सराबोर था। “क्षात्र धर्म की जय हो” के नारों से वातावरण गुंजायमान हो रहा था। अवसर था सात जिलों से आई 150 बालिकाओं के चार दिवसीय मातृ शक्ति प्रशिक्षण शिविर के समापन का।

प्रातःकाल ध्वज पूजन के साथ कार्यक्रम का आरंभ हुआ। बालिकाओं ने पूरे उत्साह के साथ सामूहिक जयघोष लगाया, जो उनके भीतर उमड़ते गर्व और उत्साह का प्रतीक था।

शिविर प्रमुखा शायर कंवर ने समापन समारोह में बालिकाओं को संबोधित करते हुए कहा कि इस शिविर से मिली प्रेरणा और संस्कारों को अपने जीवन में आत्मसात करें। उन्होंने इन संस्कारों को जीवन में उतारने का आह्वान किया। मातृशक्ति विभाग के प्रमुख जोरावरसिंह भादला का सान्निध्य शिविर में बालिकाओं को मार्गदर्शन देता रहा।

एक भावुक क्षण में सभी बालिकाओं को तिलक लगाकर विदाई दी गई। शिविर की व्यवस्थाओं में संघ के प्रांत प्रमुख जेठूसिंह पुदंलसर, गणेशसिंह श्रीडूंगरगढ़, छोटूसिंह गुसांईसर, ओमपालसिंह जोधासर और करणीसिंह पुदंलसर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समापन समारोह में क्षत्रिय समाज की महिला शक्ति भी शामिल हुई, जो बालिकाओं को आशीर्वाद देने और प्रोत्साहित करने के लिए उपस्थित थीं। श्रीक्षत्रिय युवक संघ के बैनर तले आयोजित इस शिविर में बालिकाओं और शिक्षिकाओं ने व्यवस्थाओं की मुक्त कंठ से सराहना की।

शिविर में एक विशेष आकर्षण था बालिकाओं का केसरिया गणवेश। भारतीय संस्कृति में केसरिया रंग को ओज, तेज और त्याग का प्रतीक माना जाता है। शिविर में शामिल सभी बालिकाएं केसरिया गणवेश में पूर्ण अनुशासन के साथ उपस्थित थीं। शिविर में आए दर्शनार्थियों ने गणवेश के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि इस रंग की महिमा और गौरव शिविर में स्पष्ट रूप से झलक रहा था।

शिविर में बालिकाओं के 15 घट (दल) बनाए गए थे, जिनमें विभिन्न स्थानों से आई बालिकाओं को शामिल किया गया था। पूरी तरह से अनुशासित दिनचर्या के साथ, बालिकाओं को संगठन की रीति-नीति, क्षात्र धर्म और समाज में नारी शक्ति के योगदान के बारे में विस्तार से बताया और समझाया गया। इस शिविर के माध्यम से किशोरियों ने आपसी तालमेल का पाठ भी सीखा।

शिविर संचालिका शायर कंवर अवाय (जैसलमेर) ने बताया कि शिविर में चार दिनों तक सुबह 4.30 बजे जागरण से दिनचर्या शुरू होती थी। योगासन, व्यायाम, ध्यान, प्रार्थना, बौद्धिक और विनोद सत्रों के माध्यम से बालिकाओं को क्षत्रिय कुल परंपरा, नारी शक्ति का महत्व, नारी शक्ति का उत्थान और वीरोचित गुणों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।

वीरांगनाओं की जीवनियों के बारे में बताया गया और चर्चा सत्र में उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया गया। जिससे बालिकाएं रील नहीं रियल यानी वास्तविक जीवन का समझ सकें व वीरता की प्रेरणा ले सकें। शायर कंवर ने कहा कि इतिहास गवाह है कि किसी भी बालक की अद्वितीय क्षमताओं के उद्घाटन में उसकी माता का और उनके संस्कारों का सबसे अधिक प्रभाव होता है। ऐसे में आज संस्कृतियों के संक्रमण काल में हमें समाज के उज्ज्वल भविष्य के लिए वीर व संस्कारवान माताओं का निर्माण करना होगा। श्रीक्षत्रिय युवक संघ व पूज्य तनसिंहजी के विचारों से प्रेरित होकर शिविर में यही प्रयास किया गया। इन बालिकाओं ने शिविर में बिना मोबाइल व सोशल मिडिया के स्वयं पर, स्वाध्याय के माध्यम से ध्यान केंद्रित करने का अभ्यास किया। बालिकाओं को समाज व देश की वर्तमान परिस्थितियों के साथ अपने यश गौरव का समन्व्य करने के बारे में बताया गया। उन्हें क्षात्र धर्म के निर्वहन की प्रेरणा दी गई। शिविर में बालिकाओं को स्वयं के बारे में तथा हमारी पूर्वज रही महान माताओं के बारे में जानने का अवसर मिला। शिविरार्थी बालिकाओं ने शिविर से जीवन की दिशा का ज्ञान होने की बात कही।

यह शिविर न केवल बालिकाओं के लिए एक प्रशिक्षण कार्यक्रम था, बल्कि उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ भी साबित हुआ। शिविर में प्राप्त ज्ञान और अनुभव निश्चित रूप से उन्हें भविष्य में एक बेहतर इंसान बनने और समाज में सकारात्मक योगदान देने के लिए प्रेरित करेंगे।

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