श्रीडूंगरगढ़, 20 अगस्त 2025। अंचल में आज सुबह से ही बछबारस के पर्व की छटा बिखरी हुई थी। सुहागिनों ने पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ इस पर्व को मनाया। यह दिन, जो माँ और संतान के अटूट प्रेम का प्रतीक है, श्रीडूंगरगढ़ में बड़ी धूमधाम से मनाया गया।
प्रातःकाल से ही महिलाओं ने व्रत और उपवास रखकर दिन की शुरुआत की। नए परिधानों से सजी-धजी, वे पूजा की थाल सजाकर गौमाता और बछड़े के पूजन के लिए निकलीं। गाय और बछड़े को तिलक लगाया गया, उन्हें गुड़, चना, मूंग, मोठ, मक्का और दही खिलाया गया। गौमाता को चुनरी ओढ़ाई गई, मानो प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की जा रही हो।
घरों में गोबर से तलाई बनाई गई और महिलाओं ने बछबारस की कथा का श्रवण किया। इस कथा में माँ और बछड़े के स्नेह की महिमा का वर्णन है, जो हर माँ के हृदय को छू जाता है। माताओं ने अपने पुत्रों को तिलक लगाकर उन्हें मिठाई खिलाई और उनकी लंबी उम्र की कामना की।
वरिष्ठ महिला हेमलता देवी मोदी ने बताया कि बछबारस के दिन गाय के दूध का प्रयोग नहीं किया जाता। साथ ही, गेहूं और चाकू से कटे हुए अन्न का भी त्याग किया जाता है। घरों में बाजरे की रोटी और मूंग, मोठ व चना का साग बनाया जाता है, जो इस पर्व का पारंपरिक भोजन है।
महिलाओं द्वारा गौपालकों को वस्त्र भेंट किए जा रहे हैं, जो गौमाता की सेवा करने वालों के प्रति सम्मान का प्रतीक है। विभिन्न स्थानों पर घरों के सामने और गौशालाओं में पूजन के विशेष आयोजन हो रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं भाग ले रही हैं।
बछबारस का यह पर्व श्रीडूंगरगढ़ में न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह माँ और संतान के बीच के अटूट बंधन को भी दर्शाता है। यह एक ऐसा अवसर है जब महिलाएं एक साथ मिलकर अपने परिवारों की सुख-समृद्धि और अपने पुत्रों की दीर्घायु के लिए प्रार्थना करती हैं। इस पर्व की सादगी और श्रद्धा हर किसी को भाव-विभोर कर देती है।