शहर में, किशोर प्रजापत, पूनमचंद प्रजापत, भूराराम प्रजापत, शंकरलाल, किशोरीलाल और नरसी प्रजापत के परिवार, तन और मन से मिट्टी को आकार देकर दीयों में ढाल रहे हैं। पुरुष सदस्य दीये बना रहे हैं, तो महिलाएं और बच्चे उन्हें सुखाने और पकाने में जुटे हैं।
किशोर बताते हैं कि आधुनिक झालरों के आगमन से दीयों की मांग में कमी आई है। वे क्षेत्रवासियों से अपील करते हैं कि इस दीपावली, अपने घरों को मिट्टी के दीयों से रोशन करें। “दीपावली दीये की है, इन झालरों की नहीं,” वे कहते हैं। किशोर आगे बताते हैं कि उनका परिवार तीन पीढ़ियों से दीये बनाने के काम में लगा है। कभी हर घर में चाक घूमता था, बच्चे भी इस कला में माहिर थे, पर अब इस काम में उतनी आमदनी नहीं रही, इसलिए युवा पीढ़ी दूसरे कामों की ओर रुख कर रही है।
बारस के दिन से दीपावली तक, ये परिवार बाजार में अपनी दुकानें लगाते हैं। किशोर बताते हैं कि इन चार दिनों में वे अपने हाथों से बनाए दस हजार से अधिक दीये बेचने का प्रयास करेंगे। बरसात का दौर थमते ही, वे इस काम में जुट जाते हैं। लेकिन इस बार मिट्टी के भाव आसमान छू रहे हैं। किशोर बताते हैं कि मिट्टी के भाव में 40 से 45 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। ऐसे में, हाथ से दीये बनाना और उन्हें पकाना, मेहनत को जोड़कर देखें तो लागत भी निकालना मुश्किल हो रहा है। ये परिवार कोलायत, लखासर और गुसाईंसर बड़ा से मिट्टी मंगवाते हैं। ऊंट गाड़ी वाले को 1500 रुपये देकर या कोलायत से 600 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से मिट्टी लानी पड़ती है। कार्तिक पूर्णिमा तक दीयों की बिक्री चलती है, जिसके बाद वे अगली गर्मी के लिए मटकी बनाने और पकाने के काम में लग जाते हैं।
इस बीच, पार्षद प्रतिनिधि नानूराम कुचेरिया ने क्षेत्रवासियों से अपील की है कि वे मिट्टी के दीयों का ही प्रयोग करें। उनका कहना है कि मिट्टी के दीये न केवल शास्त्र सम्मत हैं, बल्कि शुभता के भी प्रतीक हैं। वे रोशनी के साथ सुख और समृद्धि में वृद्धि करते हैं, इसलिए इस दीपोत्सव पर झालरों के स्थान पर दीयों से अपने घरों को रोशन करें।
इन परिवारों की मेहनत और उम्मीदें मिट्टी के इन दीयों में समाई हैं। क्या इस दीपावली, श्रीडूंगरगढ़ उनकी पुकार सुनेगा? क्या दीये की लौ, झालरों की चकाचौंध को मात दे पाएगी? यह देखना बाकी है।