श्रीडूंगरगढ़, 4 दिसंबर 2025: प्रेम और कर्तव्य के बीच की एक जटिल कहानी आज श्रीडूंगरगढ़ में देखने को मिली। एक माँ की ममता और बुढ़ापे में सहारे की उम्मीद को अदालत का सहारा मिला, जब बेटे और बहू को उनके घर से बेदखल करने का आदेश दिया गया।
यह मामला आड़सर बास की रहने वाली इंद्रादेवी झंवर से जुड़ा है, जिन्होंने अपने बेटे दिनेश झंवर और बहू रीना झंवर के खिलाफ अदालत में एक दीवानी मुकदमा दायर किया था। इंद्रादेवी ने अदालत से गुहार लगाई थी कि उनके द्वारा खरीदे गए मकान को बेटे और बहू के कब्जे से मुक्त कराया जाए। उनका तर्क था कि वे उस घर की कानूनी रूप से हकदार हैं और उन्हें अपने ही घर में रहने का अधिकार है।
अदालत ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए 17 जनवरी 2024 को इंद्रादेवी के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने आदेश दिया कि मकान को बेटे और बहू से खाली कराया जाए।
हालांकि, आदेश के बावजूद, मकान खाली नहीं किया गया। इस पर इंद्रादेवी ने अदालत की अवमानना की सूचना दी। वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश एवं अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट हर्ष कुमार ने इसे गंभीरता से लेते हुए डिक्री जारी की। उन्होंने थानाधिकारी श्रीडूंगरगढ़ को आदेश दिया कि मकान खाली कराकर इंद्रादेवी को सौंपा जाए।
कल, 3 दिसंबर 2025 को, पुलिस एसआई पवन शर्मा, हैड कांस्टेबल रामस्वरूप बिश्नोई, दो महिला कांस्टेबल और आरएसी के जवान मौके पर पहुंचे। पुलिस ने अदालत के आदेश का पालन करते हुए मकान को जबरन खाली कराया और इंद्रादेवी को सौंप दिया। इस कार्रवाई ने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया कि रिश्तों की डोर कितनी नाजुक होती है और संपत्ति के विवाद में अक्सर भावनाएं किस कदर आहत होती हैं।
इंद्रादेवी की ओर से पैरवी एडवोकेट राधेश्याम दर्जी और एडवोकेट गोपाल पारीक ने की। उन्होंने अदालत में माँ का पक्ष मजबूती से रखा और उन्हें न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बताया जा रहा है कि दोनों पक्षों के बीच पहले से ही कुछ फौजदारी मामले भी दर्ज हैं, जिन पर अदालत में सुनवाई चल रही है। यह घटना रिश्तों में आई खटास और पारिवारिक विवादों की एक दुखद तस्वीर पेश करती है। यह मामला निश्चित रूप से समाज में बुजुर्गों के अधिकारों और पारिवारिक मूल्यों पर एक नई बहस को जन्म देगा।