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कवियों ने मंच पर बिखेरे विभिन्न भावों के रंग, राजस्थानी भाषा की मान्यता को लेकर जताई चिंता।

कवि अनिल कुमार ‘रजन्यंश’ ने अपने काव्य पाठ से समां बांध दिया। उनकी कविता “मन के मन के टूटे सब तार मन के, ठन के ठन के छूटे सब यार ठन के…” ने खूब तालियां बटोरीं। उन्होंने श्रृंगार रस से ओत-प्रोत अपनी रचना से श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। ‘रजन्यंश’ ने सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर भी अपनी चिंता व्यक्त की।

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि डॉ. विमला महरिया ने मधुर स्वर में लोकगीत ‘बावनिया’ सुनाकर श्रोताओं को हंसाया और राजस्थानी लोक संस्कृति की झलक दिखाई। उन्होंने होली के रंगों पर एक व्यंग्य भी प्रस्तुत किया, जिसमें आधुनिक तकनीक के कारण त्योहारों के फीके पड़ते रंगों पर प्रकाश डाला गया।

कवि प्रदीप महरिया ने अपनी राजस्थानी रचना में आज की राजनीति और भ्रष्टाचार पर तीखा कटाक्ष किया, जिसे श्रोताओं ने खूब सराहा।

मुख्य अतिथि छैलू चारण ‘छैल’ ने करणी अराधना से काव्य पाठ की शुरुआत की। उन्होंने वात्सल्य रस से सराबोर छंद सुनाकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। छैल ने राजस्थानी भाषा को मान्यता न मिलने का दोष राजनीति को देते हुए अपनी पीड़ा व्यक्त की। उन्होंने श्रृंगार रस में भी अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं।

कार्यक्रम के अंत में संस्था द्वारा सभी कवियों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम अध्यक्ष श्याम महर्षि ने युवाओं को जिम्मेदारीपूर्ण कार्य करने और साहित्य की काव्य विधा को समृद्ध करने में योगदान देने के लिए प्रेरित किया। सत्यदीप भोजक ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। कवियत्री भगवती पारीक ‘मनु’ ने कुशलतापूर्वक मंच संचालन किया।

‘गीतों का गजरा’ कार्यक्रम में काव्य प्रेमियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और काव्य रस का आनंद उठाया। कार्यक्रम में संस्था मंत्री रवि पुरोहित, डॉ. मदन सैनी, सत्यनारायण योगी, रामचन्द्र राठी, नारायण सारस्वत, महेश जोशी, महावीर सारस्वत, तुलसीराम चोरड़िया, विजय महर्षि, सरोज शर्मा, मनसा सोनी, पवन सारस्वत, विश्वनाथ तंवर, अब्दुल शकूर सिसोदिया, पूनमचंद गोदारा, प्रदीप कुमार दीप, बुधमल सैनी, संजय पारीक, शुभकरण पारीक, मुकेश कुमार, ओमप्रकाश राजपुरोहित, अमित सहित अनेक साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।

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