श्रीडूंगरगढ़ ONE 12 जनवरी 2026। वर्ष 2016 में नगरपालिका द्वारा कस्बे का कचरा एक जगह पर डालने के लिए कालू रोड़ पर वन विभाग की भूमि के पास पालिका भूमि पर डम्पिंग यार्ड बनाया गया और डम्पिंग यार्ड बनाने के साथ ही यहां एक ही सिस्टम लागू हो सका कि “जिंदा हाथी लाख का, मरा तो सवा लाख का,”। दुर्भाग्य है कि यहां पर कहावत में तो हाथी है लेकिन वास्तव में यहां निराश्रित गौवंश की हो रही मौतें कहीं ज्यादा फायदेमंद हो रही है। पूरा का पूरा सिस्टम ही इसी ढर्रे पर चल रहा है एवं गौवंश की मौतों से जुड़ी जन-भावनाओं पर हर कोई अपनी राजनीतिक रोटियां सेक रहा है। साथ ही करोड़ों के वारे-न्यारे भी इन मौतों के बाद हो रहे है, पढ़ें अनकही, अनसुनी।
शुरू में केवल तेल का खेल, अब करोड़ों का बजट।
श्रीडूंगरगढ़ ONE। नगरपालिका द्वारा डम्पिंग यार्ड 2016 में शुरू हुआ एवं शुरूआत में मुनाफा खेल सारा शहर से डम्पिंग यार्ड की करीब पांच किलोमीटर दूरी में लगने वाले प्रतिदिन के तेल का ही था। नगरपालिका द्वारा टैम्पू टिपर खरीदे गए व प्रतिदिन वास्तविक से कहीं ज्यादा चक्कर कागजों में लगते रहें। जब तक पालिका निर्मित कचरे का पहाड़ नहीं बना था, तो खेल सारा तेल का ही रहा और तब से अब तक लगातार यह तेल का खेल आज तक जारी है। प्रतिवर्ष लाखों रुपए का भुगतान ठेकों के माध्यम से पालिका के टैम्पू होने के बाद भी केवल परिवहन व मेंटेनेंस के नाम पर नगरपालिका कर रही है। अभी जो खेल चल रहा है वह तो और अधिक फायदेमंद हो गया है, क्योंकि ठेके के अनुसार शहर में घर घर पहुंच कर कचरा संग्रहण करने वाले टैम्पू टिपर कागजों में तो शहर से डम्पिंग यार्ड तक चलते है लेकिन वास्तव में ठेकेदार द्वारा कालू रोड़ पर नगरपालिका फाटक वाले स्थान पर टैक्सियों से कचरा उतारा जाता है एवं ट्रेक्टर ट्रॉली से कचरा डम्पिंग यार्ड तक भेजा जाता है। ऐसे में एक ट्रॉली में करीब 8 से 10 टैम्पू टिपर का कचरा चला जाता है। अनकही अनसुनी बात यह है कि इस तेल के खेल में सभी शामिल है, वर्ष 2020 में लगा पहला बजट।
श्रीडूंगरगढ़ ONE। जैसे जैसे कचरे का पहाड़ बनता गया वैसे वैसे बीहड़ में घूमने वाला बेसहारा गौवंश भी खाने की तलाश में यहां पहुंचने लगा। इस गौवंश की हालत वहीं होनी शुरू हो गई जो अब वायरल वीडियो में सामने आ रही है, जनआक्रोश को देख कर 11 जुलाई 2020 को तत्कालीन एसडीएम राकेश न्योल, तहसीलदार मनीराम खीचड़ ने डम्पिंग यार्ड का अवलोकन किया। वहां भारी संख्या में गौवंश की मौजूदगी देख नाराजगी जताई गई एवं पालिका को चारदीवारी करने, चौकीदार रखने के निर्देश दिए गए। पालिका द्वारा वहां करीब 10 लाख की लागत से पट्टी-तारबंदी की गई एवं चौकीदारी का ठेका भी जारी कर दिया गया। दो सालों तक यह व्यवस्था जारी रही लेकिन धीरे धीरे वहां से तार व पट्टियां सभी कुछ गायब हो गए एवं चौकीदारी भी बंद हो गए। अनकही-अनसुनी बात यह है कि चौकीदार ही चोर निकले, तो फिर पकड़ा कौन जाए।
राज्य सरकार के आदेशों के बाद भी नहीं बनाया FSTP, बना देते तो खर्चा नहीं आय होती पालिका को।
श्रीडूंगरगढ़ ONE। केवल श्रीडूंगरगढ़ ही नहीं बल्कि पूरे राज्य के नगरीय क्षेत्रों में कचरे की समस्या का समाधान करने एवं कचरा निस्तारण कर पालिकाओं की आय बढ़ाने के लिए राज्य सरकार ने वर्ष 2021 में नगरपालिकाओं के डम्पिंग यार्ड क्षेत्र में FSTP बनाने के निर्देश दिए। इस आदेश की पालना में श्रीडूंगरगढ़ नगरपालिका द्वारा भी टेंडर निकाला गया एवं 16 लाख रुपए का वर्कआर्डर भी जारी कर दिया गया। लेकिन यह कार्य किया ही नहीं गया, यह कार्य हो जाता तो इसमें दीवार बनाना, कचरे में से प्लास्टिक, थैली, सुखा कचरा, गीला कचरा, आदि को अलग अलग करने के लिए अलग अलग शेड बनने थे। यह कार्य हो जाता तो कचरा बीनने के ठेके होते एवं पालिका को यहां खर्चा करने के बजाए आय की संभावना बढ़ जाती। साथ ही गौवंश द्वारा हर प्रकार का कचरा खाने की समस्या भी नहीं रहती। अनसुनी अनकही बात यह है कि पालिका द्वारा खर्च करने में कहीं ज्यादा खांचे रहते है बजाय आय के, इसलिए आस पास की सभी नगरपालिकाओं में यह FSTP बन गई वहीं श्रीडूंगरगढ़ नगरपालिका में ऐसा कुछ नहीं किया गया है।
दो करोड़ से कहीं अधिक हो गए 2024 में खर्च, अब फिर से होगा बड़ा खर्चा।
श्रीडूंगरगढ़ ONE। डम्पिंग यार्ड में गौवंश के कचरा खाकर मर जाने की स्थिति से पूरा क्षेत्र बार बार उद्वेलित हो रहा है। वहीं जितनी बार यह जन आक्रोश सामने आता है उतनी बार ही नगरपालिका द्वारा करोड़ों रुपए का खर्चा किया जाना तय हो जाता है। शनिवार को खबर भी सामने आई कि क्षेत्रीय विधायक ताराचंद सारस्वत के प्रयासों से कचरे के सम्पूर्ण निस्तारण के लिए आगामी 20 वर्षों तक का एमओयू किया जाना है। ऐसे में आक्रोश का स्थाई समाधान कोई क्यों करें जब जिंदा हाथी लाख व मरा हाथी सवा लाख वाली कहावत चरितार्थ हो। वर्तमान हालातों से पहले वर्ष 2024 में भी ऐसे ही हालात बने थे एवं उस समय भी विधायक सारस्वत ने 24 मई 2024 को नगरीय विकास मंत्री झाबरमल खर्रा को पत्र देकर कचरे का सम्पूर्ण निस्तारण करवाने की मांग की गई थी। इसके बाद एक बड़ा टेंडर हुआ एवं कचरा पीस कर मिट्टी बनाने वाली ट्रोमल मशीन 17 जून 2024 को श्रीडूंगरगढ़ के डम्पिंग यार्ड में पहुंची। मशीनों ने कचरा पीसना भी शुरू कर दिया एवं 17 अगस्त 2024 को स्वयं विधायक ने मौका निरीक्षण कर कचरे का स्थाई समाधान होने की बात कही। कचरे को पीस कर बनाई गई मिट्टी से श्रीडूंगरगढ़ में कालू रोड़ पर कच्चे जोहड़ में, हाई-स्कूल के पीछे के मैदान में भर्ती भी करवाई गई। कचरे के स्थाई समाधान के सपने देख रहे क्षेत्रवासियों को बाद में पता चला कि करीब सवा दो करोड़ रुपए के टेंटर में यह मशीन कुछ ही समय के लिए क्षेत्र में आई थी। बताया जा रहा है कि 550 रुपए प्रति क्यूबिक मीटर की दर से करीब 40 हजार क्यूबिक मीटर कचरा पीसने का ही टेंडर किया गया था। अब कितने क्यूबिक मीटर कचरा हटाया गया यह तो भुगतान करने वालों ने ही नापा था, पर कचरा तो यहां जस का तस ही नजर आया। अनकही, अनसुनी बात यह है कि अब एक बार फिर से गायों की मौतों के बाद जन आक्रोश बढ़ा है, तो एक बार फिर से इसी ड्रोमल मशीन के भारी रेटों वाले टेंडरों के साथ आने की चर्चाएं गर्म हो गई है।
कथित क्रांतिकारियों को मिली उर्जा, सबके अपने अपने लक्ष्य।
श्रीडूंगरगढ़ ONE। डम्पिंग यार्ड में कचरा खाकर अकाल मृत्यु का सामना करने वाली गौमाताएं कईयों के लिए जीवनदायनी बन रही है। यहां के हालातों पर वास्तविक गौप्रेमी बेहद आहत है एवं लगातार अपना विरोध आक्रोश के साथ जताते हुए स्थाई समाधान की मांग रहें है। लेकिन साथ ही कई कथित क्रांतिकारियों के लिए भी यह अपने आप को प्रचारित करने का मौका बन गया है। साथ ही विभिन्न राजनैतिक दलों के लोगों द्वारा भी अपने अपने लक्ष्यों को पूरा करने वाले कमेंट, पोस्ट सोशल मीडिया पर बूस्ट किए जा रहे है। अनेकों गौवंश की असमय मृत्यु के बाद बने ऐसे हालातों को देख कर अनकही-अनसुनी बात यही है कि गाय तो माता है और माता तो मर कर भी अपनी संतानों का भला ही चाहती है। पर समाज में जरूर ऐसे क्रांतिकारियों के लिए निराशाजनक माहौल बन रहा है।